बच्चों की नई हिंदी कहानियां अच्छी अच्छी | Hindi Kahaniya

Spread the love

बच्चों की नई हिंदी कहानियां अच्छी अच्छी: दोस्तों आज हम कुछ नयी अच्छी अच्छी कहानियाँ आपके साथ सांझा कर रहे है जो पढ़कर आपको अच्छी लगेगी तो पढ़ते रहिये और अच्छी लगे तो शेयर कीजिएगा।

कछुए की कहानी | बच्चों की नई हिंदी कहानियां अच्छी अच्छी

गंगा नदी से सटा एक पोखरा था, जिसके प्राणी इच्छानुसार नदी का भ्रमण कर वापिस भी आ जाते थे।

जलचर आदि अनेक प्राणियों को दुर्भिक्ष-काल की सूचना पहले ही प्राकृतिक रुप से प्राप्य होती है। अत: जब पोखर-वासियों ने आने वाले सूखे का अन्देशा पाया वे नदी को पलायन कर गये। रह गया तो सिर्फ एक कछुआ क्योंकि उसने सोचा:

“हुआ था मैं पैदा यहाँ

हुआ हूँ मैं युवा यहाँ

रहते आये मेरे माता-पिता भी यहाँ

जाऊँगा मैं फिर यहाँ से कहाँ!”

कुछ ही दिनों में पोखर का पानी सूख गया और वह केवल गीली मिट्टी का दल-दल दिखने लगा। एक दिन एक कुम्हार और उसके मित्र चिकनी मिट्टी की तलाश में वहाँ आये और कुदाल से मिट्टी निकाल-निकाल कर अपनी टोकरियों में रखने लगे। तभी कुम्हार का कुदाल मिट्टी में सने कछुए के सिर पड़ी। तब कछुए को अपनी आसक्ति के दुष्प्रभाव का ज्ञान हुआ और दम तोड़ते उस कछुए ने कहा:-

चला जा वहाँ

चैन मिले जहाँ

जैसी भी हो वह जगह

जमा ले वहीं धूनी

हो वह कोई

वन, गाँव या हो तेरी ही जन्म-भूमि

मिलता हो जहाँ तुझे खुशी का जीवन

समझ ले वही है तेरा घर और मधुवन

सियार न्यायधीश की कहानी

किसी नदी के तटवर्ती वन में एक सियार अपनी पत्नी के साथ रहता था। एक दिन उसकी पत्नी ने रोहित (लोहित/रोहू) मछली खाने की इच्छा व्यक्त की। सियार उससे बहुत प्यार करता था। अपनी पत्नी को उसी दिन रोहित मछली खिलाने का वायदा कर, सियार नदी के तीर पर उचित अवसर की तलाश में टहलने लगा।

थोड़ी देर में सियार ने अनुतीरचारी और गंभीरचारी नाम के दो ऊदबिलाव मछलियों के घात में नदी के एक किनारे बैठे पाया। तभी एक विशालकाय रोहित मछली नदी के ठीक किनारे दुम हिलाती नज़र आई। बिना समय खोये गंभीरचारी ने नदी में छलांग लगाई और मछली की दुम को कस कर पकड़ लिया।

किन्तु मछली का वजन उससे कहीं ज्यादा था। वह उसे ही खींच कर नदी के नीचे ले जाने लगी। तब गंभीरचारी ने अनुतीरचारी को आवाज लगा बुला लिया। फिर दोनों ही मित्रों ने बड़ा जोर लगा कर किसी तरह मछली को तट पर ला पटक दिया और उसे मार डाला। मछली के मारे जाने के बाद दोनों में विवाद खड़ा हो गया कि मछली का कौन सा भाग किसके पास जाएगा।

सियार जो अब तक दूर से ही सारी घटना को देख रहा था। तत्काल दोनों ही ऊदबिलावों के समक्ष प्रकट हुआ और उसने न्यायाधीश बनने का प्रस्ताव रखा। ऊदबिलावों ने उसकी सलाह मान ली और उसे अपना न्यायाधीश मान लिया। न्याय करते हुए सियार ने मछली के सिर और पूँछ अलग कर दिये और कहा –

“जाये पूँछ अनुतीरचारी को,

गंभीरचारी पाये सिर,

शेष मिले न्यायाधीश को,

जिसे मिलता है शुल्क।”

सियार फिर मछली के धड़ को लेकर बड़े आराम से अपनी पत्नी के पास चला गया।

दु:ख और पश्चाताप के साथ तब दोनों ऊदबिलावों ने अपनी आँखे नीची कर कहा-

“नहीं लड़ते अगर हम, तो पाते पूरी मछली,

लड़ लिये तो ले गया, सियार हमारी मछली,

और छोड़ गया हमारे लिए,

यह छोटा-सा सिर; और सूखी पुच्छी।

घटना-स्थल के समीप ही एक पेड़ था जिसके पक्षी ने तब यह गायन किया –

होती है लड़ाई जब शुरु,

लोग तलाशते हैं मध्यस्थ,

जो बनता है उनका नेता,

लोगों की समपत्ति है लगती तब चुकने,

किन्तु लगते हैं नेताओं के पेट फूलने,

और भर जाती हैं उनकी तिज़ोरियाँ।

दुष्ट सपेरा और बंदर की कथा – Baccho ki kahaniya in hindi

हज़ारों साल पहले वाराणसी में एक सँपेरा रहता था। उसके पास एक साँप और एक बंदर था। लोगों के सामने वह उनके करतब दिखा जो पैसा पाता उससे ही अपना गुजर-बसर करता था। उन्हीं दिनों वाराणसी में सात दिनों का एक त्यौहार मनाया जा रहा था, जिससे सारे नगर में धूम मची हुई थी।

सँपेरा भी उस उत्सव में सम्मिलित होना चाहता था। अत: उसने अपने बंदर को अपने एक मित्र के पास छोड़ दिया जिसके पास एक विशाल मक्के का खेत था। मक्के का खेतिहर बंदर की अच्छी देखभाल करता और समय पर यथायोग्य भोजन भी कराता रहा।

सात दिनों के बाद वह सँपेरा वापिस लौटा। उत्सव का मद और मदिरा का उन्माद उस पर अब भी छाया हुआ था। खेतिहर से जब अपने बंदर को वापिस लेकर वह अपने घर को लौट रहा था तो अकारण ही उस बन्दर को एक मोटे बाँस की खपची से तीन बार मारा जैसे कि वह एक ढोल हो। घर लाकर उसने बंदर को अपने घर के पास के एक पेड़ से बाँध दिया और मदिरा और नींद के उन्माद में पास पड़ी खाट पर बेसुध सो गया।

बंदर का बंधन ढीला था। थोड़े ही प्रयत्न से उसने स्वयं को रस्सी से मुक्त कर लिया और पास के पेड़ पर जा बैठा।

सँपेरे की जब नींद टूटी और बंदर को उसने मुक्त पाया तो पास बुलाने के उद्देश्य से उसने उसे पुचकारते हुए कहा, “आ जा ओ अच्छे बंदर! आ जा मेरा बंदर महान्!!” बंदर ने तब उसके प्रत्युत्तर में कहा-“ओ सँपेरे! वृथा है तुम्हारा यह गुणगान क्योंकि बंदर होते नहीं महान्।” फिर वह बंदर तत्काल ही वहाँ से उछलता कूदता कहीं दूर निकल गया और सँपेरा हाथ मलता ही रहा गया।

बच्चों की नई हिंदी कहानियां अच्छी अच्छी

Leave a Comment