भोजन विषाक्तता क्या है

Spread the love

भोजन विषाक्तता: संसार में होने वाली सबसे अधिक बीमारी जुकाम के बाद खाद्य विषाक्तत्ता को माना जाता है। हर साल हजारों लोग इसके शिकार होते हैँ।

भोजन करने के दो-तीन घंटों के बाद या खाना खाने के तुरंत खाद उलटी और दस्त होना, तबीयत खराब होना खाद्य-विषाक्तता के कारण होता है।

भोजन विषाक्त क्यों होता है

भोजन स्वयं विषाक्त नहीं होता, बल्कि उसमें विषाक्तता का प्रवेश रोगाणुओं, जीवाणुओं, रसायनों, धातुओं के गलत उपयोग या दूषित वातावरण द्वारा होता है। विवाहोत्सवों, त्योहारों पर अकसर पकवान और मिठाइयां दो-तीन दिन पहले से ही बना ली जाती हैं।

बड़ी तादाद में बने ये खाद्य खुले पात्रों में रख दिए जाते हैं, जिन पर जीवाणुओं और रोगाणुओं का शीघ्र प्रभाव होता है और इसी कारण सैकड़ों व्यक्ति एक साथ पीड़ित होते हैं।

उदर विकार, अफारा, पेचिश, अपच, खट्टी डकारें, दस्त, वमन आदि लक्षण जब हमारी सामान्य पाचन-क्रिया के फलस्वरूप होते हैं, तो देर से प्रकट होंगे और यदि ये भोजन के तुरंत बाद कुछ घंटों में ही तीव्रता के साथ उदर में पीड़ा, पसीना, ज्वर, सिर दर्द लिए प्रकट हो, तो इन्हें खाद्य विषाक्तता के कारण ही समझना चाहिए। इसके इलाज में देरी करना प्राणघातक भी सिद्ध हो सकता है।

भोजन विषाक्तता के प्रकार

खाद्य विषाक्तता (फूड पायजनिंग) दो प्रकार की होती है – रासायनिक और जीवाणु जन्य। रसायनों का अंधाधुंध उपयोग होने के कारण हमारे प्राय: सभी खाद्य पदार्थ उससे प्रभावित होने लगे हैं। खाना पकाने के बरतनों, विशेषकर तांबे और पीतल मे, जब देर तक दही, अचार, कच्चे आम, इमली, सिरका आदि रखते है, तो उसमें हुई रासायनिक क्रिया से खाद्य पदार्थ विष तुल्य बन जाते हैं।

बरतनी में किए जाने वाले एनामिल में एंटीमनी नामक विषैले पदार्थ का प्रयोग किया जाता है। एनामिल के निकल जाने पर अम्लीय खाद्य पदार्थों में यह विष आसानी से घुल जाता है। इसलिए कलई किए हुए बरतन भी कम हानिकारक नहीं होते।

मिलावट का प्रभाव

आजकल बाजार में बिकने वाली हर सात खाद्य वस्तुओ में से एक मिलावट युक्त होती है। मसलन, दूध और इससे बने उत्पादों में सबसे अधिक मिलावट होती है। उसके बाद मसालों और अनाजों में मिलावट पाई जाती है। यहां तक कि चाय, कॅाफी, मिठाई तथा मीठे पदार्थों में भी मिलावट को जाती है।

अनेक हानिकारक रंग भी विभिन्न पेयों, केक, चाकलेट, मिठाइयों, पेस्ट्री आदि में कई चार उपयोग में कर लिए जाते हैं, जो जांच में पकड़ में आते हैं। घी में निकिल धातु की कुछ मात्रा मिला देने से वह विषैला बन जाता है। यह बात लखनऊ के औद्योगिक विष-विज्ञापन अनुसंधान केन्द्र में किए गए अनुसंधानों से पता चली है। वनस्पति तेल को घी में परिवर्तित करने के लिए एक किलो शुद्ध तेल में निकिल धातु (उरुप्रेरक के रूप में) की मात्रा अधिकतम 2 5 ग्राम तक हो सकती है। निकिल के दुष्परिणाम से होने वाले रोगों में खुजली, त्वचा शोथ और अल्सर प्रमुख हैं।

साग-भाजी, फलों आदि पर छिड़काव किए जाने वाले कीटनाशकों तथा खादों में मरक्यूरेट्स, लैड आरसनेट होते हैं। इनकी अधिक मात्रा पतले दस्त और वमन उत्पन्न कर शरीरगत जल का अंश खत्म कर सकते हैं। आलू में हमें कभी-कभी हरा-सा हिस्सा दिखाई पड़ता है, जो सोलेनिन नामक रासायनिक विष होता है, जिसके खाने से दस्त और उल्टियां हो सकती है।

इसी प्रकार जीवाणुजन्य विषाक्तता मुख्यत: चार जाति के जीवाणुओं से उत्पन्न होती है। ये जीवाणु एक प्रकार का जीव विष (टाक्सिन) उत्पन्न कर हमारे खाद्य पदार्थों को विषाक्त कर देते हैं। जब ये आमाशय और आंतों पर अपना हमला बोलते हैं, तो रोग को उत्पत्ति होती है। इन्हें सामान्य आंखों से नहीं देखा जा सकता।

खाद्य विषाक्तता की सबसे अधिक घटनाएं स्टैफिलोकॅाक्स नामक जीवाणु की वजह से होती हैं। विशेषकर गर्मी और वर्षा ऋतु में ये जीवाणु दही, अंडा, चावल, मछली, मांस आदि पर अकसर मिलते हैं, जिनकी उपस्थिति का आभास सामान्यतया नहीं हो पाता। इनके लगने पर परत भी जमा हो जाती है।

ये एक प्रकार का प्रोटीन निर्माण करते है, जो विषाक्तता उत्पन्न करता है। यह प्रोटीन जनित पदार्थ गर्म करने पर भी अपना असर नहीं छोड़ता, जबकि जीवाणु इससे मर जाते हैं। विषाक्तता के लक्षणों में ये जीवाणु पेट में ऐंठन, मितली, सिर दर्द, उलटी, अतिसार और शरीर में पानी की कमी लाते हैं।

सेल्मोनेला नामक जीवाणु मनुष्यों, जानवरों, हवा, पानी सभी जगह रह सकते हैं। ये गर्म करने से मर जाते हैं। इनका कार्य आंतों में जाकर पाचन क्रिया में व्यवधान डालना है। पीड़ित व्यक्ति को ज्वर के साथ वमन, दस्त सिर दर्द की शिकायत पैदा होती है।

अन्य प्रकार के जीवाणु क्लास्ट्रेडियम परफेरिंजेंस हैं, जिन पर ताप का प्रभाव नहीं होता, क्योंकि अनुकूल वातावरण न मिलने के कारण ये अपने चारों ओर एक कवच बना लेते हैं। मिट्टी मेँ मिलने के कारण गंदे बरतनों, फलों, सब्जियों के माध्यम से यह हमारे पेट में जाकर स्टैफिलोकॉकस के विष जैसे लक्षण पैदा करते हैं।

क्लास्ट्रीरेडियम बोटूलीनम मिट्टी और पानी में रहते है और सभी जीवाणुओं में सबसे खतरनाक हैं। जहां हवा भी न हो, वहां तक इनकी पहुंच होती है। खाद्य पदार्थों के बीच घुसकर ये फैलते है और अपना विष पैदा करते हैं। इसे खाना गरम कर नष्ट किया जा सकता है। जो पदार्थ खाने से पूर्व गर्म न करके ठंडे ही खाए जाते है उनमें ये ज्यादा रहते हैं।

कुछ फफूंद भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं। डबल रोटी या चपाती पर रुई की तरह लगी फफूंद राइजोपस नामक कवक से पैदा होती है। एस्मरजिलस फ्लेवस नामक फफूंद लगने से दूषित अनाज में ‘एस्मरजिलस’ नामक खतरनाक स्राव पैदा होता है जो जानलेवा हो सकता है। फफूंद लगी चीजें खाने से आमाशय और आंतों की तकलीफें, उलटी, दस्त सिर दर्द, बुखार, चक्कर आना आदि शिकायते हो सकती हैं।

हमारे कुछ भोजन ऐसे भी होते है जो असमान मात्रा में सेवन करने पर तो अमृत का काम करते है, लेकिन समान मात्रा में लेने पर विष तुल्य प्रभाव रखते हैं जैसे शहद और घी। इसी प्रकार मट्ठा और शहद कांसे के बर्तन में रखा घी (दस दिन से ज्यादा समय तक रखने पर), कटहल खाने के बाद पान खाना, घी और शहद के किसी भी परिणाम के साथ, शहद के साथ चिकनाई, फल और ऊपर से जल का सेवन भी कम हानिकारक नहीं है। इस प्रकार की खाद्य विषाक्तता से भी बचने का प्रयत्न करना चाहिए।

खाद्य-विषाक्तता से बचाव कैसे करें

  • रोग से बचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खाद्य सामग्री को तैयार करने, पकाने, उठाने और रखने में कार्यरत व्यक्तियों को सफाई और स्वच्छता पर सख्ती से ध्यान देना चाहिए। इनका पालन करके घर में और सार्वजनिक भोजन में विषाक्तता से काफी हद तक बचा जा सकता है।
  • बासी, फफूंद लगी, खुली पड़ी हुई खाद्य सामग्री खाने से बचे।
  • खाद्य विषाक्तता से बीमार व्यक्ति को चिकित्सा सहायता तुरंत दिलवाएं अन्यथा परिणाम प्राणघातक भी हो सकता है।
  • खुली मिठाइयों, खुले फलों का सेवन न करें।
  • यदि कोई चीज़ ज्यादा हो तथा उसे रखना हो, तो उसे बिना पानी के एवं तेल या घी में फ्राई करके ही रखें।
  • रखने वाली चीजों में टमाटर या अन्य खट्टे पदार्थ न मिलाएं।
  • विषाक्त हुए भोज्य पदार्थ को लालचवश कदापि न खाएं।

भोजन विषाक्तता क्या है

Leave a Comment