दमा (श्वास) – कारण,लक्षण,उपाय

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दमा का कारण: फेफड़ों में स्थित श्वासनलियों में दो प्रकार के नाड़ी सूत्र होते हैं। एक प्रकार के नाड़ी सूत्र जिनके उत्तेजित होने से एसीटाइलकोलीन की उत्पत्ति होती है, कोलीनर्जिक कहलाते हैं तथा दूसरे प्रकार के नाड़ी सूत्र जिनके उत्तेजित होने से एड्रीनलीन की उत्पत्ति होती है, एडरीनर्जिक कहलाती हैं।

कोलीनर्जिक अथवा पैरासिम्पेथैटिक नाड़ी सूत्रों के उत्तेजित होने से श्वासनलियों की श्लेष्मकला फूल जाती है तथा उसमें स्थित श्लेष्म ग्रंथियों का स्राव (बलगम) बढ़ जाता है। इससे एक ओर श्वासनलियों के अंदर का मार्ग तंग हो जाता है, दूसरा उसमें बलगम जमा होता चला जाता है, जिससे सांस लेने में कठिनाई उत्पन्न होती है।

श्वास नलियों में संकुचन उत्पन्न करने वाले कोलीनर्जिक नाड़ी सूत्रों के उत्तेजित होने के विभिन्न कारण हैं, जिनमें विभिन्न दवाएं, भोजन यहां तक कि ठंडी हवा भी शामिल है। यह रोग वंशानुगत भी है, जिसका कारण नाड़ी मंडल की निर्बलता है। चिंता, व्याकुलता, निराशा आदि मानसिक कारणों से भी कोलीनर्जिक (पैरा सिम्पेथैटिक) नाड़ी सूत्र उत्तेजित होकर दमा को उत्पन्न करते हैं।

असत्म्यता (एलर्जी) के कारण भी श्वास रोग हो सकता है, क्योंकि एलर्जी करने वाले तत्व जैसे धूल, फूलों के परागकण, भोजन, वस्त्र, पेट के कीड़े, कब्ज के कारण आंत में बनने वाला विष श्वासनलियों में विद्यमान किसी जीवाणु का विष आदि नाक तथा श्वासनलियों की श्लेष्मकला में विक्षोभ व सूजन पैदा करते हैं, जो अंतत: श्वास रोग का कारण बनता है।

दमा का लक्षण

श्वासनलियों के तंग हो जाने से सांस के अंदर-बाहर जाने में काफी कठिनाई होती है, जिससे रोगी को सांस खिंच कर आता है।

दमा का घरेलू उपाय

आधा चम्मच रीठे के छिलके का चूर्ण सुबह खाली पेट एक सप्ताह तक रोगी को पानी के साथ सेवन कराएं। इससे दस्त और उलटी होगी तथा दमा ठीक हो जाएगा। इस दौरान मरीज को खाने के लिए थोड़ा-सा घी डालकर खिचड़ी दें।

छोटी इलायची के बीज व मालकांगनी के बीज एक-एक ग्राम साबुत, 1 सप्ताह तक सुबह के समय पानी से निगलवाएं।

फूली हुई सफेद फिटकिरी तथा मिसरी बराबर मात्रा में पीसकर इसमें से 2 ग्राम सुबह के समय पानी के साथ खिलाएं।

आक का एक पत्ता और 25 काली मिर्चे लेकर खूब घोटें तथा मटर के दाने के बराबर की गोलियां बना लें। रोगी को 1 गोली सुबह के समय पानी के साथ खिलाएं।

एक-एक चम्मच सरसों का तेल, बांसे के पत्तों का रस एक चम्मच तथा बेलपत्र के पत्तों का इतना ही रस मिलाकर एक सप्ताह तक दिन में एक बार दें।

तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस बराबर की मात्रा में शहद मिलाकर सुबह-शाम चटाएं।

तुलसी की पत्ती और कली 3-3 ग्राम लेकर पाव भर पानी में पकाएं। एक चौथाई रह जाने पर स्वादानुसार पुराना गुड़ मिलाकर लें। दिन में तीन से चार बार दें।

अदरक के एक चम्मच रस में बराबर का शहद मिलाकर सुबह-शाम दें।

छोटी पीपल, सोंठ और आंवला। सबको समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनाएं। आधा चम्मच चूर्ण, आधा चम्मच देसी घी व एक चम्मच शहद मिलाकर दें।

श्वास के वेग के समय बहेड़े का छिलका मुंह में रखकर चूसें।

पेठे का चूर्ण आधा चम्मच की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ दिन में दो बार लें।

छोटी पिप्पल और सेंधानमक बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। अदरक के एक चम्मच रस के साथ 1 ग्राम चूर्ण रात को सोते समय लें।

अदरक का रस, अनार का रस व इतना ही शहद मिलाकर 4-4 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम लें।

सूखे अंजीर व मुलेठी बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर छान लें। इसका एक चम्मच चूर्ण बराबर मात्रा में शहद के साथ लें।

शलगम उबालकर उसका पानी रोगी को पीने को दें।

एक ताजा घिया लेकर उस पर जौ के आटे का लेप करें तथा सुलगती हुई राख में दबा दें। भुन जाने पर पानी निचोड़कर सुबह-शाम 100-100 ग्राम की मात्रा में पिलाएं।

रोगी को दिन में तीन-चार बार पके हुए अंगूर खिलाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

अगस्त्य हरीतकी अवलेह, वासावलेह, व्याघ्रीहरीतकी अवलेह, वासारिष्ट, कनकासव, तालीशादिचूर्ण, सोमयोग, चन्द्रामृत रस, अपामार्ग क्षार।

पेटेंट औषधियां

अस्थिगोन सीरप (एमिल), स्पाजमा सीरप (चरक), डिवाइन आस्था कैप्पूल (बी.एम.सी.), व एमेस्थावलेह (माहेश्वरी) श्वास रोग में प्रभावकारी।

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