ध्वनि प्रदूषण किसे कहते हैं – रोचक जानकारी

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ध्वनि प्रदूषण: अत्यधिक शोर या ध्वनि प्रदूषण जानलेवा भी साबित हो सकता हैं, अथवा कई बीमारियों का कारण भी बन सकता है। एक अनुमान के अनुसार, अपनी सदी में शहरी आबादी के 40 प्रतिशत लोग बहरेपन का शिकार तो होगे ही, साथ ही साथ मानसिक अस्वस्थता तथा ह्रदय रोगो से भी परेशान होगें।

ध्वनि प्रदूषण (शोर) क्या है?

साधारण आवाजें से अधिक ऊंची आवाजें शोर कहलाती हैं। घर में रेडियो, ट्रांजिस्टर, टी.वी., स्टीरियो डेक का शोर, बाहर निकलते ही मोटर गाड़ियों के हॉर्न का शोर , हवाई जहाज का शोर, कारखानों में मशीनों की खटपट का शोर, नुक्कड़ों पर लाउडस्पीकरों की चिंघाड़, रेलवे स्टेशन के आसपास रेल की कर्णभेदी ध्वनियां आदि सुनाई पड़ना अब दैनिक जीवन की आम बातें हो गई हैं।

ध्वनि प्रदूषण (शोर) की कितनी मात्रा सहनीय?

शून्य डेसीबल की ध्वनि हमें सुनाई नहीं पड़ती, क्योंकि फुसफुसाहट की आवाज ही 20 डेसीबल की होती है। हम सामान्य रूप से जिस ध्वनि में बात करते हैं, उसको तीव्रता 30 से 50 डेसीबल के बीच होती हैं। 45 डेसीबल तक का शोर सहनीय माना जाता है।

कान पर ध्वनि का कुप्रभाव 80 डेसीबल से ही शुरू हो जाता है। 120 डेसीबल की ध्वनि से कान के पर्दे फट सकते हैं, आदमी बहरा हो सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार सुरक्षा की दृष्टि से मनुष्य की 115 डेसीबल में 15 मिनट, 110 डेसीबल में आधा घंटा, 105 डेसीबल मेँ एक घंटा, 100 डेसीबल मेँ दो घंटे, 95 डेसीबल में चार घंटे और 90 डेसीबल में आठ घंटे से ज्यादा समय व्यतीत नहीं करना चाहिए।

सामान्य शोर की तीव्रता डेसीबल में इस प्रकार आंकी गई है- ऑफिस में बाबुओं का शोर-60, अलार्म घड़ी की आवाज-70, टाइपराइटर की खटपट-50, टेलीफोन की घनघनाहट-70, साइलेंसर विहीन मोटर साइकिल की आवाज-120, वायुयान के इंजन की ध्वनि-110, कारखानों की मशीनें-120, जेट यान की आवाज-150 डेसीबल तक होती है। हमारे कानों की रचना कुछ इस प्रकार की है कि हम एक सेकंड में 20 हजार से अधिक कंपन गति को नहीं सुन सकते। सामान्यतया 1000 से 5000 के बीच की ध्वनि तरंगे हम आसानी से सुन सकते हैं।

शोर की अधिकता से हानियां

शोर चाहे किसी भी स्थिति में हो, मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। शोर से नींद में जो बाधा उत्पन्न होती है उससे काफी हानि होती है। शोर से न केवल कानों, बल्कि मस्तिष्क, कैंद्रीय तंत्रिका तंत्र तथा आमाशय पर भी बुरा असर पड़ता है।

शोर की अधिकता से मनुष्य में तनाव बढ़ता है, रक्तचाप में वृद्धि होती है, मिरगी के रोगियों को अधिक दौरे पड़ते है, सिर दर्द पैदा होना, भूख मर जाना, अनिद्रा की तकलीफ होना, ह्रदय गति बढ़ना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन, गर्भवती महिलाओ द्वारा अविकसित शिशुओं को जन्म देना, पागलपन, मानसिक बीमारियां, पसीना आना रक्त में कोलेस्ट्राल बढ़ना, मांस-पेशियां संकुचित होना रतौंधी, घबराहट, वर्णांधता बेहोशी, गुर्दों में विकृति, थकावट महसूस होना, स्मरण शक्ति लुप्त होना, कानों में घंटियां बजने की आवाजें सुनाई देना, गेस्ट्रिक अल्सर, दमा, शरीर में झुर्रियां पड़ना, मासिक धर्म समय से पहले प्रारंभ होना, विवेकशीलता घटना ये सब शोर के ही दुष्परिणाम हैं।

आस्ट्रिया के ध्वनि विज्ञानी डॉ. ग्रिफिथ का कथन है कि शोरमय वातावरण में रहने वाले लोग अपेक्षाकृत जल्दी बूढ़े हो जाते है। एक अन्य निष्कर्ष के अनुसार, कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों में से अधिकाशं को आंशिक बहरापन घेर लेता हैं साथ ही उनकी सहनशीलता और कार्यक्षमता को भी घटा देता है।

शोर का सबसे बुरा प्रभाव स्कूली बच्चों पर पड़ता है। इसके प्रभाव से उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है और पढ़ाई में कम ध्यान लगता हैं। शोर-शराबे वाले इलाकों में रहने वाले 60 प्रतिशत छात्र पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाते हैं। 40 प्रतिशत बहरेपन का शिकार हो जाते है तथा उनको सिर दर्द तथा चिड़चिड़ाहट की शिकायत हो जाती है।

शोर पर नियंत्रण के उपाय

वातावरण का शोर शरीर और मन, दोनों के विक्षुब्ध करता है। विदेशों में तो ध्वनि प्रदूषण के खतरों को पहचानते हुए कानून बना कर शोर की अधिकतम सीमा निर्धारित कर दी गई है, लेकिन हमारे देश में इस बात की आवश्यकता है कि शोर प्रदूषण के खिलाफ एक व्यापक अभियान छेड़ा जाए। लोगों को इसके दुष्परिणामों के प्रति अवगत कराएं। इसे नियंत्रित करने के लिए निम्म उपायों को अपनाएं:

  • घर में और बाहर इस्तेमाल होने वाले ध्वनि विस्तारक यंत्रों का कम-से-कम और धीमी आवाज में प्रयोग करें।
  • उद्योग धंधों, कारखानों को स्थापना आबादी से दूर करें, ताकि शोर के दुष्प्रभावों से बचाव हो सके।
  • हवाई अड्डों के आसपास कम-से-कम 10 किलोमीटर के क्षेत्र में बस्ती न बनने दी जाए।
  • कारखानों में काम करने वाले कर्मचारी इयर प्लग, इयर मफ, इयर ग्लास आदि का प्रयोरा डूयूटी के दौरान करें एवं मफलर पहनें।
  • खाली स्थानों पर घनी पतियों वाले वृक्ष अधिक–से–अधिक लगाएं। ये सबसे सस्ते ध्वनिशोषक साबित हुए हैं।
  • त्यौहारों पर अत्यंत तेज ध्वनि उत्पन्न करने काले बमों का प्रयोग न करें। केवल कम ध्वनि वाली आतिशबाजी चलाएं।
  • घर की दीवारें मोटी बनाएं। उस पर हलका नीला या हरा रंग पुतवाएं। मुख्य द्वार ट्रैफिक वाले रोड की तरफ न रखें।
  • उपरोक्त सुरक्षात्मक उपाय अपना कर शोर के घटाने का उपाय कर सकते हैं।

ध्वनि प्रदूषण किसे कहते हैं – रोचक जानकारी

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