गलघोंटू – कारण,लक्षण,उपाय

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गलघोंटू का कारण: यह रोग प्राय: 2-7 वर्ष की आयु के बच्चों में होता है। यह डिप्थीरिया बेसिलस नामक जीवाणु से फैलता है। इसका संक्रमण गले से शुरू होता है और धीरे-धीरे सारे शरीर में फैल जाता है। यदि उचित समय पर इसकी चिकित्सा शुरू न की जाए तो यह रोग घातक सिद्ध होता है।

संक्रमित रोगी के छींकने या खांसने से इस रोग के जीवाणु फैलते है। जिन बच्चों के गले में पहले ही संक्रमण या सूजन हो, उनमें यह रोग होने की संभावना अधिक होती है। गले में संक्रमण के साथ ही यह जीवाणु एक विष छोड़ता है, जो बहुत जल्दी सारे शरीर में फैल जाता है।

गलघोंटू का लक्षण

गले में सफेद चमड़े जैसी एक झिल्ली बन जाती है, जो इस रोग का विशेष चिह्न होती है। झिल्ली के चारों ओर की श्लेष्मकला में सूजन होती है। शरीर में विष फैलने के साथ ही बुखार, सुस्ती व कमजोरी के लक्षण प्रकट होते जाते हैं। गले में सूजन आने से सांस लेने में कठिनाई होती है।

मस्तिष्क व हृदय के मांस में विष फैलने के साथ ही रोगी के बचने की संभावना कम होती चली जाती है। इसमें तापमान 1000 फारेनहाइट के करीब होता है, नाड़ी तेज (प्रतिमिनट 110 के लगभग) होती है। इसमें गला ज्यादा नहीं दुखता है।

गलघोंटू का घरेलू उपाय

कच्चे पपीते का ताजा रस इस रोग में विशेष रूप से लाभदायक होता है। पपीते का रस व शहद मिलाकर गले में लगाने से झिल्ली समाप्त होती चली जाती है और संक्रमण की वृद्धि तत्काल रुक जाती है। साथ ही रोगी की हालत में सुधार आता चला जाता है।

लहसुन भी इस रोग में विशेष रूप से प्रभावी है। रोगी को लगातार लहसुन चूसते रहना चाहिए। लहसुन के रस से सफेद झिल्ली समाप्त होती चली जाती है, संक्रमण की वृद्धि रुक जाती है और रोगी ठीक होना शुरू हो जाता है। दिन भर में कम-से-कम 10 ग्राम लहसुन का रस रोगी को चूसना चाहिए।

गलघोंटू – कारण,लक्षण,उपाय

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