गठिया – कारण,लक्षण,उपाय

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गठिया का कारण: इस रोग में हाथ-पैर, कंधे, घुटने, एड़ी, कलाई आदि सहित शरीर के जोड़ों में सूजन और दर्द रहता है। प्रौढ़ावस्था में इस रोग की उत्पत्ति अधिक होती है, किंतु आहार-विहार की गड़बड़ी के कारण युवावस्था में भी यह रोग हो सकता है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में रिह्यूमैटॉयड फैक्टर को इस रोग का कारण माना गया है, जो रोगी के रक्त में पाया जाता है। आयुर्वेद में आहा-विहार की गड़बड़ी को इस रोग का मुख्य कारण माना गया है। कथित रह्यूमैटॉयड फैक्टर की उत्पत्ति विरुद्ध आहार-विहार के सेवन से शरीर में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों के फलस्वरूप ही होती है।

गठिया का लक्षण

यह एक व्यापक रोग है जो अस्थियों, पेशियों, फेफड़ों व हृदय आदि अंगों के आवरणों आदि के स्नायु तन्तुओं में होता है, जो बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है।

पहले हाथ की अंगुलियों, विशेषत: बीच की दो अंगुलियों की संधियों में सूजन से शुरू होती है। इसके बाद कलाई, कुहनी, घुटने आदि के जोड़ों में यह रोग फैल जाता है। शरीर में थकावट व कमजोरी के साथ मांसपेशियों में दर्द की शिकायत बढ़ती चली जाती है।

गठिया का घरेलू उपाय

हरड़ का 1/2 ग्राम चूर्ण 10 मि.ली. एरण्ड तेल के साथ सुबह-शाम लें।

सोंठ का 1/2 ग्राम चूर्ण 100 मि.ली. कांजी के साथ दिन में दो बार दें।

एरण्ड तेल 20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गर्म दूध के साथ दें।

सोंठ, अजवायन और बड़ी हरड़ सब को समान भाग लेकर चूर्ण बना लें एवं आधा चम्मच चूर्ण सुबह-शाम गर्म पानी के साथ दें।

बथुए के ताजा पत्तों का स्वरस डेढ़ से दो चम्मच सुबह-शाम लें। इसमें नमक, चीनी कुछ न मिलाएं।

बिनौले के तेल की मालिश करें।

मेथी के लड्डू बनाकर खाने से भी गठिया में आराम मिलता है, लेकिन ये सर्दी में खाने चाहिए।

तारपीन का तेल सरसों के तेल में मिलाकर मालिश करने से गठिया में लाभ पहुंचता है।

तुलसी की पत्तियां और एरण्ड की पत्तियों को सेंधानमक के साथ पीसकर गर्म कर लें और दर्द वाले जोड़ पर लेप करके ऊपर से कपड़ा बांध दें।

लहसुन की एक कली दिन में 2-3 बार पानी के साथ निगलें या लहसुन को देसी घी में भूनकर अचार की तरह खाएं।

नीम के तेल से नियमित रूप से संबधित जोड़ों की मालिश करें।

2 चम्मच तिल के तेल में 2-3 काली मिर्च तब तक भूनें, जब तक जल कर कोयला न बन जाए। जब इतना गर्म रहे कि लगाया जा सके, तो जोड़ों पर लगाएं।

एक भाग काली मिर्च व दो भाग सोंठ और इतना ही जीरा कूट पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 1/2 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार लें।

दिन में तीन बार रोगी को 100-100 ग्राम आलू बुखारे खिलाएं।

तरबूज का रस 50-50 ग्राम दिन में तीन बार पिलाएं। यदि सूजन अधिक हो, तो तरबूत के बीज कूटकर उनका रस भी साथ में मिला लें।

पके हुए शहतूत दिन में कई बार खिलाएं।

गठिया में सेब का प्रयोग बहुत लाभदायक है। विशेषकर उस स्थिति में, जब रक्त में यूरिक एसिड की मात्रा अधिक बढ़ी हुई हो। सेब में विद्यमान मैलिक एसिड रक्त में बढ़े हुए यूरिक एसिड की मात्रा को घटाकर गठिया सहित अन्य वात रोगों से भी शीघ्र लाभ पहुंचाता है।

गठिया आदि वात रोगों में केला भी काफी लाभदायक सिद्ध हुआ है। पांच दिन तक रोगी को सिर्फ केले खिलाएं, कुछ और खाने को न दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

त्रैलोक्य चिन्तामणि रस, वातचिन्तामणि रस, योगेन्द्र रस, महायोगराज गुग्गुल, रसराज रस, चिंतामणि चतुर्मुख रस, चतुर्मुज रस, आमवातारि रस, एरण्ड पाक औषधियां इस रोग की चिकित्सा हेतु प्रयोग की जा सकती हैं।

पेटेंट औषधियां

डिवाइन रिलीफ कैप्सूल (बी.एम.सी. फार्मा), मस्काल्ट गोलियां व मस्काल्ट फोर्ट कैप (एमिल), आर. कम्पाउन्ड गोलियां (एलारसिन), रिमानिल तेल व कैप्सूल (चरक), रुमाविट गोलियां व तेल (संजीवन), मायोस्टाल तेल व गोलियां (सोल्यूमिक्स), रूहेम गोलियां व तेल (माहेश्वरी) आमवात में अत्यन्त प्रभावकारी हैं।

गठिया – कारण,लक्षण,उपाय

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