दिल का दौरा Heart Attack – कारण,लक्षण,उपाय

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दिल का दौरा का कारण: हृदय की मांसपेशियों को रक्त आपूर्ति में बाधा या विभिन्न कारणों से हृदय की मांसपेशियों में रक्त न पहुंचने से दिल का दौरा पड़ता है। मांसपेशियों तक रक्त ले जाने वाली धमनियों में अवरोध के कारण ऐसा होता है।

यह अवरोध एकाएक पैदा नहीं होता, बल्कि धमनियों की दीवारों में कई सालों तक कोलेस्ट्रोल के लगातार जमाव होते रहने के कारण ऐसा होता है।

जब हृदय को रक्त को आपूर्ति कम होनी शुरू होती है तो व्यक्ति चलने-फिरने में बेचैनी व कभी-कभी छाती में दर्द महसूस करने लगता है। यह स्थिति हृत्शूल (एंजाइना) कहलाती है।

धमनियों में कोलेस्ट्रोल का जमाव बढ़ते जाने से हृदय की मांसपेशी को रक्त पूर्ति जब अधिक बाधिक होने लगती है, तो आराम के दौरान भी बेचैनी महसूस होने लगती है। इस स्थिति को असंतुलित हृत्शूल (अनस्टेबल एंजाइना) कहा जाता है।

धमनी में जब तीन चौथाई से अधिक अवरोध हो जाए तो व्यक्ति को कभी भी दिल का दौरा पड़ सकता है। कुछ मामलों में धमनी में पूर्ण अवरोध होने पर ही दौरा पड़ता है। दिल का दौरा रात्रि के अंतिम प्रहर या भोर के समय वह भी ठंड के मौसम में विशेष रूप से पड़ता है।

इसलिए रात्रि के अंतिम प्रहर या भोर के समय छाती में होने वाले दर्द की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दौरा पड़ने के तुरंत बाद चिकित्सा सहायता मिल जाए, तो जीवन रक्षा हो सकती है। दौरा पड़ने के बाद इलाज में जितनी देरी होगी, जीवन की संभावना उतनी ही क्षीण होती चली जाएगी।

दिल का दौरा का लक्षण

छाती में बाईं ओर दर्द की शिकायत। दर्द बाएं हाथ में विशेषकर छोटी अंगुली की ओर, गर्दन, पीठ या कन्धे की ओर भी हो सकता है।

इसमें ठंडा पसीना आना। उलटी या दस्त की शिकायत भी हो सकती है। सांस लेने में कठिनाई हो सकती है। नाखून नीले व त्वचा पीती पड़ सकती है। सीने की हड्डी के नीचे भारीपन हो सकता है।

दिल के दौरे में बेचैनी, दम घुटना व छाती में विशेष रूप से छाती के बीचोबीच दर्द होता है, जो बाएं कंधे या बाईं बांह की तरफ बढ़ता हुआ प्रतीत होता है। यह दर्द कभी-कभी गरदन, दांत, जबड़े या दाईं बांह में भी हो सकता है। घबराहट, सांस लेने में परेशानी व दिल में झटके भी महसूस हो सकते हैं।

कुछ व्यक्तियों (विशेष कर मधुमेह के रोगियों) में दर्द की शिकायत बिलकुल भी नहीं होती। दिल के दर्द व अन्य दर्दों में एक खास अंतर यह है कि दिल का दर्द कभी भी एक स्थान पर सीमित नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति अंगुली से दर्द को एक निश्चित स्थान पर दर्शाए तो यह दर्द प्राय: दिल का दर्द नहीं होता।

दूसरा अंतर यह है कि अन्य दर्द बीच-बीच में कम-ज्यादा हो सकते हैं या थोड़ी देर के लिए बिलकुल खत्म हो सकते हैं। लेकिन दिल का दर्द लगभग आधा घंटे तक लगातार बना रहता है। हृदय रोगियों को थकावट लाने वाले मेहनत के कार्य तथा तनाव से खास तौर पर बचना चाहिए।

थकावट वाले कार्य जैसे अधिक खाना, खाने के बाद नाचना, पहाड़ी पर चढ़ाई करना, बस या कार को धक्का लगाना, अच्छे सेक्स प्रदर्शन (खास कर अनजाने स्थान पर असमय व नए साथी के साथ) के प्रयास में आयु व शारीरिक क्षमता से अधिक मेहनत करना दिल के दौरे में अहम भूमिका निभाते हैं। तंबाकू मदिरा व अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों में दौरा पड़ने के बाद मृत्यु की संभावना अधिक रहती है।

सावधानी व बचाव

उच्च रक्तचाप, मधुमेह, तनावमुक्त जीवन, शारीरिक श्रम का अभाव, तंबाकू व मदिरा का सेवन, रक्त में कोलेस्ट्रोल का बढ़ा हुआ स्तर, अधिक वसा युक्त भोजन का प्रयोग दिल के दौरे के मुख्य कारण हैं। 35-40 वर्ष के पश्चात हृदय की नियमित जांच आवश्यक है, विशेष कर उपरोक्त में से किसी भी एक कारण की विद्यमानता के मामले में तो लापरवाही करनी ही नहीं चाहिए।

खाना खाने के तुरंत बाद शारीरिक श्रम बिलकुल नहीं करना चाहिए। हृदय रोगी को सात्विक भोजन के साथ सात्विक आचार-विचार में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। उपरोक्त में से किसी भी एक कारण की उपस्थिति मौत को निमंत्रण दे सकती है, अत: इनके निवारण हेतु योग व ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

दिल का दौरा का घरेलू उपाय

रोगी को सिर व कंधा थोड़ा ऊपर रखकर लिटाएं।

रोगी के वस्त्र ढीले कर दें।

सांस लेने में कठिनाई हो तो कृत्रिम सांस दें।

यदि शरीर ठंडा हो तो कंबल लपेट दें।

अर्जुन की छाल या छाल का चूर्ण पानी में उबालकर पिलाएं तथा आधा चम्मच चूर्ण जीभ के नीचे रखकर रोगी को चूसने के लिए दें।

रोगी को तुरंत अपानवायु मुद्रा में बिठाएं। अपानवायु मुद्रा में तर्जनी अंगुली को अंगूठे की जड़ में लगाएं तथा बीच की दोनों अंगुलियों (मथ्यमिका व अनामिका) के अगले सिरे अंगूठे के अगले सिरे से लगाएं।

कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) को अलग रखें। यह मुद्रा दिल के दौरे को तुरंत रोकने में अत्यंत प्रभावी है।

रोगी को तुरंत अस्पताल भेजने की व्यवस्था करें।

दौरे के समय

अर्जुन की छाल का चूर्ण आधा चम्मच की मात्रा में जीभ के नीचे रखकर चूसें व रोगी को अपानवायु मुद्रा में लिटाएं या बैठाएं। अपानवायु मुद्रा में तर्जनी (अंगूठे के पास वाली उंगली) को अंगूठे की मूल में लगाते हैं तथा कनिष्ठ (सबसे छोटी उंगली) को सीधी रखते हैं। मध्यमिका व अनामिका (बीच की दोनों अंगुलियों) के अगले सिरे अंगूठे के अगले सिरे से मिलाकर दबाव लगाते हैं।

रोगी को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं।

दौरे के बाद

अर्जुन की छाल को चूर्ण या काढ़े के रूप में नियमित रूप से प्रयोग करें। छाल का चूर्ण 10 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ प्रयोग कर सकते हैं। काढ़ा बनाने के लिए दो चम्मच चूर्ण को पाव भर पानी में उबालें व आधा रह जाने पर उतार लें। यह काढ़ा सुबह-शाम लें। काढ़े में इलायची व थोड़ा-सा दूध भी डाल सकते हैं।

लहसुन की 2 कलियां सुबह खाली पेट लें।

आयुर्वेदिक औषधियां

अर्जुनारिष्ट, मृगमदासव व शंखपुष्पी का प्रयोग कर सकते हैं।

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