रक्ताल्पता – कारण,लक्षण,उपाय

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रक्ताल्पता का कारण: रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य (13 से 16 ग्राम प्रति 100 क्यूबिक सेंटीमीटर) से कम होना या रक्त में रक्त कणों की संख्या सामान्य (50-55 लाख प्रति क्यूबिक मिलीलीटर) से कम होना रक्ताल्पता कहलाता है। यह स्थिति निम्नलिखित कारणों से हो सकती है-

लोहे की कमी : हीमोग्लोबिन के निर्माण हेतु एक स्वस्थ पुरुष को 27 मिलीग्राम लोहे की प्रतिदिन आवश्यकता होती है। इसमें से लगभग 20 मिलीग्राम टूटे हुए रक्तकणों से आता है (रक्तकण की आयु लगभग चार मास होती है और रक्तकणों का टूटना एक सामान्य प्रक्रिया है) और लगभग 7 मिलीग्राम भोजन से प्राप्त होता है।

आंतों में विदाह होने या जीवाणु संक्रमण के कारण भोजन में विद्यमान लोहा जब आंतों में भलीभांति विलीन नहीं हो पाता तो रक्ताल्पता उत्पन्न हो जाती है।

16 से 45 वर्ष की आयु की स्त्रियों में माहवारी, गर्भ धारण, बच्चों को दूध पिलाने के कारण भोजन में लोह की आवश्यकता विशेष रूप से होती है।

इस आयु में स्त्रियों को यदि मलेरिया, श्वेत प्रदर या अन्य कोई जीवाणु संक्रमण हो तो उनमें रक्ताल्पता होने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है। दुबलेपन को सौंदर्य की कसौटी मान बैठी किशोरियां और युवतियां, जो आधा-अधूरा भोजन करती हैं, रक्ताल्पता की शिकार सरलता से हो जाती हैं।

रक्त परीक्षा करने पर रोगी के सीरम में लोहे की मात्रा काफी कम मिलती है। हीमोग्लोबिन भी कम हो जाता है। आमाशय में सूजन या संक्रमण होने की स्थिति में आमाशय में अम्ल का स्त्राव काफी कम हो जाता है।

अम्ल की कमी के कारण लोहे का विलीनीकरण आंत के ड्येडीनम नामक भाग में सुचारु रूप से नहीं हो पाता, जिससे रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस स्थिति में न केवल व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता घट जाती है, बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी आ जाती है।

यदि गर्भावस्था के दौरान स्त्री को रक्ताल्पता रहे तो गर्भस्थ शिशु को लोहा कम मिलता है। गर्भ के अंतिम तीन महीनों में शिशु को लगभग 400 मिलीग्राम लोहा प्राप्त होता है।

यदि गर्भवती स्त्री को रक्ताल्पता हो अथवा किसी कारणवश शिशु समय से पहले सातवें या आठवें महीने में उत्पन्न हो जाए (रक्ताल्पता के कारण भी शिशु समय से पूर्व उत्पन्न हो सकता है), तो उसे लोहा आवश्यक मात्रा से कम मिल पाता है।

गर्भ में एक से अधिक बच्चे होने की स्थिति में भी लोहा कम मिलेगा। ऐसे मामलों में जन्म के महीने भर में ही शिशु में रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जिन बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता, उनमें भी जन्म के सात-आठ माह के बाद रक्ताल्पता उत्पन्न हो जाती है।

गाय-भैंस के दूध या डिब्बेबंद दूध में लौह की मात्रा तो कम होती ही है, लोहे के विलीनीकरण हेतु आवश्यक एसकोर्बिक एसिड भी ऐसे दूध में नहीं होता। यदि ऐसे बच्चे में बुखार जल्दी-जल्दी आता हो या क्षय रोग आदि का संक्रमण हो, तो लोहे का शरीर में विलीनीकरण और भी कम हो जाता है।

कुपोषण : रक्तकणों के निर्माण हेतु फोलिक एसिड व विटामिन बी-12 की उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है। फोलिक एसिड एसकोर्बिक एसिड की उपस्थिति में आंत में विलीनीकरण के पश्चात् यकृत में फोलीनिक एसिड के रूप में संचित होता रहता है।

यकृत से यह रक्त द्वारा मज्जा में पहुंचकर रक्तकणों के विकास में सहायता करता है। इसी प्रकार आमाशय रस में विद्यमान एक एन्जाइम भोजन से आए विटामिन बी-12 को छोटी आंत में विलीन होने योग्य बनाता है, जहां से यह यकृत में जाकर संचित होता है। रक्त के द्वारा यकृत से अस्थिमज्जा में जाकर यह रक्तकणों के विकास में सहायता करता है।

भोजन में यदि विटामिन बी-12 अथवा फोलिक एसिड की कमी हो तो अस्थिमज्जा में रक्तकण मैंगेलोब्लास्ट अवस्था से नोरमो ब्लास्ट की अवस्था में विकसित नहीं हो पाते।

इस अवस्था में जांच करने पर रक्तकणों का आकार सामान्य अवस्था (7.2 माइक्रोन व्यास) के बजाय बढ़ा हुआ। (8.4 माइक्रोन) मिलता है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इसे मैकरोसाइटिक एनीमिया के नाम से जाना जाता है।

यकृत रोग : यकृत वृद्धि, यकृत शोथ व यकृत के अन्य रोगों में जब रक्तकणों के निर्माण हेतु आवश्यक तत्वों का यकृत में संचय नहीं हो पाता, तब भी रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

औषधि जन्य रक्ताल्पता : कुछ एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग से शरीर में फोलिक एसिड या विटामिन बी-12 की कमी हो जाती है जिसके फलस्वरुप रक्तकणों का निर्माण प्रभावित होने से शरीर में रक्ताल्पता हो जाती है।

इनमें डैराप्रिम, रिफामाइसीन, फिनायनटाइन व बारबिचूरेट औषधियां प्रमुख हैं। अत: रक्ताल्पता दृष्टिगोचर होने पर रोगी से पूर्व में ली गई दवाओं के बारे में जानकारी लेना अत्यंत आवश्यक है।

रक्तस्राव जन्य रक्ताल्पता : चोट लगने या अन्य किसी कारण से तीव्र रक्तस्त्राव होने से भी रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कैंसर, बवासीर, परिणाम शूल (पेप्टिक अल्सर) आदि रोगों व पेट में कीड़े होने से चिरस्थाई रक्तस्त्राव की स्थिति में भी रक्ताल्पता उत्पन्न हो सकती है।

विष जन्य रक्ताल्पता : जीवाणु संक्रमण की विषाक्तता का प्रभाव अस्थिमज्जा पर होने से रक्तकणों के निर्माण में बाधा पड़ती है। इसी प्रकार हैपेटाइटिस, कैंसर, जीर्ण वृक्क रोग, मूत्र विष संचार आदि रोगों में शरीर में विषैले द्रव्यों की उत्पत्ति से शरीर में रक्तकणों की मात्रा में कमी हो जाती है

सीसा, सोना, रेडियम, संखिया आदि द्रव्यों तथा फिनाइनटाइन, क्लोरमफैनिकोल, क्लोरप्रोमाजीन, मैपाक्राइन आदि औषधियों के दुष्प्रभाव से भी रक्तकणों का विनाश हो जाता है और रक्तकणों के निर्माण में बाधा आती है।

रक्ताल्पता का लक्षण

शरीर में पीलापन, भार में कमी, चक्कर आना, शरीर में अशक्ति अनुभव होना इस रोग के लक्षण हैं।

रक्ताल्पता का घरेलू उपाय

कारण व लक्षणों के आधार पर रक्ताल्पता की चिकित्सा की जाती है। सामान्यत: हरी व पत्तेदार सब्जियों, गाजर, आम, अनार, चीकू सेब आदि फलों से रक्ताल्पता की चिकित्सा की जा सकती है।

यदि आमाशय की गड़बड़ी हो, तो अजवायन, सौंफ, हरड़ व आंवले का प्रयोग उत्तम है। पेट में कीड़े हों तो उनकी दवा लें। यदि यकृत का कोई रोग हो तो उसकी चिकित्सा कराएं।

किसी औषधि के प्रयोग से हुई विषाक्तता के कारण हुई रक्ताल्पता में औषधि का प्रयोग बन्द करें। निम्नलिखित आहार द्रव्यों का भोजन में विशेष रूप से प्रयोग कर रक्ताल्पता की समस्या का निवारण किया जा सकता है-पालक, बथुआ, गाजर, शलगम, सेब, संतरा, चुकंदर, प्याज, जामुन, आंवला, अंगूर, पपीता, आम, चौलाई, मुनक्का, अंजीर, ख़ूबानी, खजूर, अंकुरित चने, बादाम, केला, मसूर की दाल, टमाटर, किशमिश आदि।

आयुर्वेदिक औषधियां

नवायस लौह, लौह भस्म, मंडूर भस्म, पुनर्नवादि मंडूर, लोहासव, आरोग्यवर्धिनी वटी।

पेटेंट औषधियां

एमीरोन गोलियां व शरबत (एमिल), मैनोल सीरप व कैप्सूल (चरक), फेरोन कैप्सूल (माहेश्वरी), त्रिंगासव (माहेश्वरी)।

रक्ताल्पता – कारण,लक्षण,उपाय

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