कीटनाशको का उपयोग एवं समस्याएं

Spread the love

कीटनाशको का उपयोग एवं समस्याएं: कीटनाशकों का छिड़काव फसलों को रोगों से बचाव करने के लिए करते है। परन्तु उन फसलों के फूल, फल या डंठल-पत्ते खाने से शरीर में उन दवाइयों के हानिकारक तत्व पहुंचकर तमाम तरह की परेशानियां उत्पन्न करते हैँ। इसलिए इनसे बचना वर्तमान के प्रदूषित वातावरण में और भी आवश्यक हो गया है।

कीटनाशक दवाओं के दुष्परिणाम

विश्व बैंक द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में प्रति वर्ष 25 लाख लोग कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के शिकार होते है तथा कम से कम 5 लाख लोग मौत के मुंह में समा जाते है।

तीसरी दुनिया, यानी भारत सहित अन्य विकासशील देशों में जितने रसायनों का निर्माण और उपयोग किया जाता है, उनका दुष्परिणाम भी यहां अधिक देखने को मिलता है।

इन देशों में सबसे ज्यादा मौतें कीटनाशकों के कारण होती है। ये इतने विषाक्त होते है कि कीट-पतंगों, खेती के कीड़ों को आसानी से नष्ट कर देते है।

आज हम बहुत से ऐसे कीटनाशकों का उपयोग कर रहे है, जिन पर अमेरिका, मलेशिया आदि देश प्रतिबंध लगा चुके है। जिनमें डैल्टिन, ई. पी. एन., क्लोरेडेन, फास्वेल आदि पमुख हैं।

कृषि विज्ञान अनुसंधान केन्द्र, दिल्ली द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, दिल्ली के आसपास के इलाकों में कीटनाशकों का असर 20 प्रतिशत अधिक है।

कीटनाशको का अंधाधुंध छिड़काव से नुक़सान

उपज को कीड़ों की मार से बचाने के लिए आजकल कीट-नाशकों के रूप में अंधाधुंध जहर छिड़कने का सिलसिला चल पड़ा है जिसने हमारे खाने-पीने को वस्तुओं से लेकर जानवरों के चारे तक की दूषित कर दिया हैं।

आम भारतीय खाने में रासायनिक विषाक्तता का स्तर संसार के किसी भी देश को तुलना में सबसे अधिक है। शाकाहार की तुलना में मांसाहार में कीटनाशक विष की मात्रा 5 से 25 प्रतिशत अधिक पाई गई है।

निरंतर चलता चक्र

छिड़काव के दौरान कीटनाशक के कुछ अंधा वायु को दूषित करते हैं, कुछ फसलों में शोषित हो जाते हैं, तो कुछ अंश मिट्टी में चले जाते है।

मिट्टी का हिस्सा पानी में घुलकर नदियों में पहुंच जाता है और जल के जीवों में भी कीटनाशक के अंश पहुंच जाते हैं, जिनको खाने से मनुष्य पीड़ित होता हैं। फसलों पर छिड़के रसायन फल सब्जियों के माध्यम से हमारे आहार में सम्मिलित हो जाते है और इस प्रकार का चक्र निरंतरर चलता रहता है।

भारत में धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाले डी. डी. टी. का उपयोग अनेक देशों में प्रतिबंधित है। हमारे खून में डी.डी.टी. की मात्रा अधिक होने पर कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है साथ ही यह हमारे गुर्दों , होंठों, जीभ व यकृत को भी हानि पहुंचाता है।

बी. एच. सी. रसायन तो डी. डी. टी. से ढाई गुना अधिक जहरीला है। हमारे देश में गेहूं और अन्य फसलों पर अधिक उपयोग में लाया जाने वाला डी.बी.सी.पी. कैंसर और नुपंसकता जैसी तकलीफें पैदा करता हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग के स्थान पर इसके विकल्प साधनों, जैसे जैविक नियंत्रण विधि तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व यांत्रिक तरीको को अपनाया जाना चाहिए।

दुनिया के कई देशों में इनका व्यापक प्रयोग सफलता पूर्वक किया जा रहा है, जिससे कीटनाशकों की खपत में एक तिहाई की कमी आई है और फसलों का उत्पादन भी 20 प्रतिशत बढ़ गया है।

कीटनाशको का उपयोग एवं समस्याएं

Leave a Comment