मूत्र विष – कारण,लक्षण,उपाय

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मूत्र विष का कारण: वृक्कों का मुख्य कार्य है शरीर में अवांछित, विषैले पदार्थों को मूत्र के साथ बाहर निकाल देना। शरीर में बढ़े हुए अम्लीय द्रव्यों के शरीर से निष्कासन होते रहने से रक्त में अम्लीय द्रव्यों की वृद्धि नहीं हो सकती।

रक्त में यूरिया, यूरिक एसिड व क्रिएटीनीन की मात्रा बढ़ जाने से यह रोग होता है। दूसरे पेशाब में सोडियम कम मात्रा में निकलने तथा जलीय अंश अधिक मात्रा में निकलने से भी यह रोग हो जाता है।

ब्लड प्रेशर बढ़ने, मूत्र मार्ग में अवरोध होने, प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि से यह रोग हो सकता है। इसी प्रकार जीर्ण वृक्क शोथ, मधुमेह जनित वृक्क रोग आदि के उपद्रव के रूप में भी यह रोग हो सकता है।

यह रोग शरीर में निर्जलीकरण के कारण भी हो सकता है। रक्त में प्रोटीन के पाचन से उत्पन्न होने वाले पदार्थों की मात्रा बढ़ने से भी यह रोग हो सकता है। किसी भी कारण से शरीर में विषाक्तता होने से यह रोग उत्पन्न हो सकता है।

मूत्र विष के लक्षण

पेशाब बार-बार आना, विशेषकर रात के समय पेशाब की अधिकता रक्ताल्पता तथा उच्च रक्त चाप। मस्तिष्क को रक्त कम मिलने से याददाश्त में कमी, एकाग्रता में कमी, बैचेनी, बात-बात पर क्रोध आना आदि लक्षण हो सकते हैं। उच्च रक्तचाप के कारण लगातार सिर दर्द व कानों से आवाजें आने की शिकायत हो सकती है।

रोगी को नींद जल्दी आती है ओर जल्दी ही टुट जाती है। थोड़ा-सा परिश्रम वाला कार्य करते ही सांस फूलने लगता है। दृष्टि मंद हो जाती है। शरीर में दुबलापन आता चला जाता है।

मूत्र विष का घरेलू उपाय

रोगी को कम प्रोटीन युक्त भोजन देना चाहिए, पानी अधिक पिलाएं। दिन में तीन-चार बार एक-एक कटोरी दूध दे सकते हैं।

तुलसी की 20 पत्तियों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम दें।

रोगी को पपीता, आंवला व मेथी का सेवन अधिक कराएं।

करेला व अनार का रस 4-4 चम्मच मिलाकर सुबह-शाम दें।

गाजर का रस 1 गिलास सुबह-शाम पिलाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

गोक्षुरादिक्वाथ, चंद्रप्रभावटी, चन्दनासव, गोक्षुरादिवलेह, बंगभस्म, पुनर्नवामंडूर आदि।

मूत्र विष – कारण,लक्षण,उपाय

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