पाद रोकने के नुकसान

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पाद रोकने के नुकसान: मल मूत्र, छींक, प्यास, अपान वायु, निद्रा, अक्ष्रु वेग (पाद) रोकना ठीक नहीं होता। इससे हमारे कष्ट बढ़ जाते हैं। हमारा यह अपराध आयुर्वेद की भाषा में ‘प्रज्ञापराध’ कहलाता है, जिसका अर्ध है-जानबूझकर बुद्धि के विपरीत कार्य करना।

अनेक लोग मल, मूत्र अपान वायु निष्कासन के वेगो को लज्जा या आलस्यवश रोके रहते हैं। यथा समय बिना किसी रुकावट के उपर्युक्त वेगो का विसर्जन मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। यहां तक कि भूख को रोकना, जम्हाई को रोकना, शुक्राशय से निकले वीर्यं को रोकना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

हमारे शरीर में किसी-न-किसी शारीरिक प्रक्रिया के दौरान या बाद में तरह-तरह के वेग निर्मित होते हैं, जिन्हें रोकने या धारण करने की कोशिश न कर अनुभूति होते ही तत्काल इनका विसर्जन कर देने से सेहत अच्छी बनती है, क्योंकि शरीर के भीतर रुके विजातीय द्रव्य की वृद्धि होने से रोग प्रकट होने लगते है। इससे शरीर की स्फूर्ति जाती रहती है और उसका स्थान आलस्य ग्रहण कर लेता है।

पाद रोकने के नुकसान

पाद को रोकने से क्या-क्या तकलीफें हो सकती है यहा विस्तृत रूप से बताई जा रहीं हैं:

  • मूत्र के वेग को रोकने से शरीर में टूटन की सी पीड़ा , अश्मरी (पथरी) तथा मूत्राशय, या मूत्रमार्ग मेँ वेदना शूल भी हो सकता हैं।
  • मल का वेग जान बूझकर रोकने से पिंडलियों में ऐंठन, सिर दर्द, प्रतिश्याय (सर्दी-जुकाम), शिरो रोग आदि विकार उत्पन्न होते हैं।
  • अपान वायु को रोकने से पेट में दर्द, शरीर में वेदना, भूख कम लगना, ह्रदय विकृति, आंखों मेँ भारीपन, दृष्टि विकृति आदि कष्ट हो सकते हैं।
  • छींक के वेग को रोकने पर सिर में दर्द, इंद्रियों में दुर्बलता तथा शरीर में अकड़ने की उत्पत्ति हो सकती है।
  • प्यास रोकने से मुख-शोथ (मुंह सूखने की बीमारी) , शरीर एवं मन में उत्साह कम होकर कमजोरी होना बेहोशी, चक्कर आना, भ्रम और ह्रदय रोग की उत्पत्ति होती है।
  • नींद के वेग को रोकने से सिर व नेत्रों में भारीपन, आलस्य, जम्हाई, शरीर में दर्द की-सी वेदना होने के कष्ट हो सकते है।
  • भूख की रोकने से शरीर का कमजोर होना लीवर में खराबी आना, शरीर टूटने की भी वेदना, अरुचि, मानसिक अवसाद उदर में शूल, भ्रम की उत्पत्ति होती है। लंबे समय तक भूखा रहने से मूर्च्छा भी आ सकती है, यहां तक कि व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।
  • खांसी का वेग रोकने से इसमें और भी बढ़ोतरी हो जाती है। अरुचि, श्वास व ह्रदय रोग की संभावना बढ़ जाती है।
  • वीर्य के वेग को रोकने से मूत्र के साथ आगें-पीछे अथवा सर्वदा शुक्र का स्राव होने लगता है। इन्दिय में पीड़ा, अंडकोष में हलकी सूजन, पेशाब का रुक-रुक कर उतरना, शरीर में टूटने की-सी अनुभूति, अंगड़ाइयां, अंडवृद्धि, पथरी और नपुंसकता की उत्पत्ति भी हो सकती है।
  • वमन (उलटी) की रोकने से विसर्प रोग, कुष्ठ, शीत पित्त, नेत्र रोग, पीलिया, ज्वर, खांसी श्वास, हिचकी, सूजन, जान में अरुचि, जी घबराना, चर्म रोग, भूख की कमी आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
  • आंसुओं के वेग को रोकने से आंखों, सिर और ह्रदय में पीड़ा होती है। सारे शरीर में भारीपन, भोजन में अरुचि, भ्रम, गरदन का अकड़ना आदि कष्ट हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त अत्यंत्य स्नेही की मृत्यु पर आंसू रोकने और गुमसुम रहने से हार्ट-अटैक भी हो सकता है।
  • डकार को रोकने से हिचकी भोजन में अरुचि, छाती में जकडन. शरीर का कांपना, पेट में गैस जैसे रोग हो सकते है। अत: यह जरूरी है कि वेगों को हम न रोकें।

पाद रोकने के नुकसान

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