पंचतंत्र की छोटी कहानियाँ with moral in hindi

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पंचतंत्र की छोटी कहानियाँ with moral in hindi: कथाएँ कहानिया काल्पनिक होते हुए भी मन में उड़ान भर देने वाली और शिक्षाप्रद होती हैं। इनमें विभिन्न पात्रों जैसे कि मानवीकृत पशु, पक्षिओं, वृक्षों, अप्सराएँ, पिशाच, राक्षस, जादूगर, दानव और सारी प्रकृति का मिलनसार होता है।

कई ऐसे मजेदार पात्र भी होते है जिन्हे बड़े हों या छोटे सब पसंद करते हैं। बच्चों को पंचतंत्र की छोटी कहानियाँ इसलिए अच्छी लगती हैं क्योंकि इन्हें समझना आसान होता है, इनका अंत आमतौर पर सुखान्त होता है और इनमें अच्छाई की बुराई पर विजय होती है। और भी कई सारी सिख मिलती है

बला टली | पंचतंत्र की छोटी कहानियाँ with moral

सोहन अपने खेत की रखवाली कर रहा था। तभी उसने देखा कि एक व्यक्ति अपने घोडे पर सरपट भागता हुआ आया और आगे निकल गया। थोडी ही देर बाद उसके पीछे-पीछे कोतवाल भी अपने सिपाहियों सहित पहुँचा। उसने सोहन से पूछा कि उसने किसी को घोड़ा ले जाते देखा है। सोहन समझ गया कि अभी जो घोड़े पर सरपट भाग रहा था। वह कोई चोर था, जिसे पकड़ने के लिए इतने सारे सिपाही उस के पीछे आये है।

उसने कहा कि ‘देखा तो है कोतवाल जी.’ वह आगे कुछ कहता इससे पहले ही कोतवाल ने कहा कि तुम हमारे साथ चलो और बताओ कि वह किधर गया है। सोहन को उसके पिता खेत की रखवाली करने के लिए छोड़ गये थे।

उसने सोचा कि चोरों को पकड़ना कोतवाल का “काम है, उसका काम तो खेत की रखवाली करना है, पर कोतवाल के आगे जो बात निकल गयी,सो निकल गयी। अब अपना काम आसान करने के लिए यह मेरे सामने मुश्किल खड़ी कर देगा। पिता भी नाराज होगें कि अपने हाथ का काम क्यो छोड़ा। आयी आफत

को टालने के लिए कोतवाल से कहा, ‘मैने देखा’है उस घोड़े के बड़े-बड़े सींग से और वह आदमी उसके सींगों में रस्सी बाँध कर इसी तरफ से गया है, आप इसी रास्ते से तेजी से चले जायें। इतना कहते ही कोतवाल ने अन्दाजा लगाया कि लड़के ने घोड़ा नहीं देखा, गाय देखी है। उसने सोहन को छोड़ा और अपने सिपाहियों सहित चोर को तलाशने के लिए आगे बढ़ गया। अपनी बला दूसरों पर टालने वाले के साथ कोई सहयोग नहीं करता।

सेर को सवा सेर

राजू पंसारी और मंगू फलवाले की दुकानें पास-पास थीं। एक दिन राजू को अलग से एक तराजू और बाट की जरुरत पड़ी। उसने मंगू से कहा, “मुझे कुछ देर के लिए तुम्हारा तराजू और बाट चाहिए। काम होते ही मैं तुम्हें लौटा दूँगा।’ मंगू ने उसे अपना तराजू और बाट दे दिया।

कुछ देर बाद जब मंगू ने अपना तराजू और बाट माँगा, तो राजू ने कहा, ‘भैया, माफ करना, मैं तुम्हें तुम्हारा सामान नहीं लौटा पाऊँगा। उसे तो चूहे खा गये।’ राजू की बात सुनकर मंगू को बहुत गुस्सा आया। लेकिन उसने गुस्सा दबाते हुए कहा, ‘कोई बात नहीं। अब चूहे खा गये हैं, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष? यह कहकर वह अपनी दुकान में चला गया।

अगले दिन मंगू ने राजू से कहा, ‘मैं तराजू और बाट खरीदने शहर जा रहा हूँ। कुछ और जरूरी सामान भी लाना है। क्या तुम अपने बेटे को मेरे साथ भेज सकतें हो? राजू ने अपने बेटे को मंगू के साथ भेज दिया। शाम को मंगू को अकेला लौटा देख राजू ने उससे पूछा,

“मेरा बेटा। कहाँ है?” मंगू, ने कहा, “क्या बताऊँ भैया,उसे सारस उठा कर ले गया।’ उसकी बात सुनकर राजू को गुस्सा आ गया। वह गुस्से से भुनभुनाते हुए बोला, ‘इतने बड़े लाड़के को भला सारस कैसे उठा कर ले जा सकता है?” मंगू ने कहा, ‘ठीक उसी तरह, जिस तरह इतने बड़े तराजू और बाट को चूहे खा सकते है।

उसकी बात सुनकर राजू को अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने मंगू को उसका सामान लौटा दिया और कहा, ‘अब तो बता दो मेरा बेटा कहाँ है? मंगू, उसे अपने घर ले गया। वहाँ उसका बेटा आराम से भोजन कर रहा था। उसे सकुशल देखकर राजू ने मंगू को धन्यवाद दिया और अपनी गलती के लिए माफी माँगी।

खजाना

एक बूढा किसान था, सुखिया। उसके तीन बेटे थे। सुखिया उन्हें अकसर खेती में हाथ बँटाने को कहता लेकिन वे बहुत आलसी थे। वे पिता की बात एक कान से सुनते और दुसरे से निकाल देते। सुखिया उनकी इस आदत से बहुत परेशान था। एक दिन उसने अपने बेटों से कहा, ‘तुम लोगों के लिए मैंने अपने खेत में एक खजाना गाड़ रखा है।

तुम तीनों खेत पर जाओ और उसे खोद कर खजाना निकाल लो।’ दुसरे दिन तीनों बेटे जल्दी उठ गये और कुदालियाँ लेकर खेत पर पहुँच गये। सारा दिन खेत खोदते रहे लेकिन खजाना नहीं मिला। शाम को वे पिता से बोले, ‘हमने सारा खेत खोद दिया, लेकिन खजाना कहीं नहीं मिला।

सुखिया ने कहा, ‘थोडी मेहनत और करो, खजाना भी मिलेगा। “अगले दिन सुखिया ने खुदे हुए खेत में बीज डाल दिये और बेटों से कहा, ‘तुम रोज खेत में समय पर पानी देते रहना, तो खजाना मिल जायेगा।’ बेटे खजाने के लालच में पिता के कहे अनुसार काम करते रहे। देखते ही देखते खेत में हरी-भरी फसल लहलहाने लगी।

लहलहाती फसल को देखकर सुखिया और उसके बेटे बहुत खुश हुए। सुखिया ने फसल की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘यही वो खजाना है, जो में तुम्हें देना चाहता था। अदि तुम लोग इसी तरह मेहनत करते रहोगे, तो हर साल तुम्हें ऐसा खजाना मिलता रहेगा।’

आधी मिली ना पूरी

एक गाँव में सुखिया नामक एक याचक रहता था। वह उतना ही लेता, जितने से उसके परिवार का निर्वाह हो जाता। ज्यादा की कामना उसे नहीं थी। एक दिन उसकी पत्नी ने कहा कि आप थोडी ओर मेहनत करो और ज्यादा घरों में माँगने जाओ, तो हमें ज्यादा मिल सकता है।

सुखिया ने कहा, ‘जितना कपाल में लिखा है, उससे ज्यादा गोपाल क्या देगा? ईश्वर हमें भूखा नहीं सोने देता, यहीं क्या कम है।’ लेकिन पत्नी नहीं मानी।

उस रोज सुखिया ने कुछ घरों के ज्यादा चक्कर लगाये और रोज चार रोटी की जगह उसे पाँच रोटी का आटा मिला। पत्नी ने कहा, ‘मैं नहीं कहती थी कि हमेशा ज्यादा की कामना करनी चाहिए।

पत्नी रोटी बनाने बैठी। उसने एक रोटी बना कर चूल्हें के पीछे रख दी। दूसरी रोटी तवे पर सिक रही थी, तीसरी अंगारों पर, चौथी रोटी का आटा उसके हाथ में था और पाँचवी रोटी का आटा कठौती में पड़ा था। अचानक कहीं से एक कुता। आया। कठौती से आटे को उठाकर ले गया। उसके पीछे-पीछे पत्नी दौडी और ठोकर खाकर गिर पड़ी। उसके हाथ में जो रोटी का आटा था, वह धूल से भर गया।

वापस आकर देखा तो तवे के पीछे की रोटी बिल्ली ले जा रही थी। तवे पर रखी रोटी तवे पर और अंगारों पर रखी हुई रोटी अंगारों पर जल गयी। एक रोटी का आटा ही नहीं गया, पाँचों रोटियाँ चली गयी। दोनों को उस रोज भूखा ही सोना पड़ा। पत्नी समझ गयी कि आधी को छोड़कर पूरी के पीछे भागने वाले आधी से भी हाथ धो बैठते हैं।

सोने की जूती

हरदयाल को हर बात में यह कहने की आदत थी। सोने की जूती सिर पर नहीं खायी जाती। एक दिन की बात है। हरदयाल को किसी ने आकर कहा कि नजदीक के गांव में एक सन्त-महात्मा आये हैं।

उनके लिए लोग कहते हैं कि डाकू भी उनके प्रवचन सुनता है, तो छलका हृदय-परिवर्तन हो जाता है। हरदयाल ने कहा कि भले ही उनके प्रवचन कितने ही उत्तम हों लेकिन सोने की जूती सिर पर नहीं खायी जाती। सब कहने की बातें हैं, व्यवहार रूप में कुछ और ही होता है। सामने वाले ने हरदवाल की बात सुनकर अपनी राह ली।

उधर, हरदयाल के मन में आया कि वह भी जाकर महात्मा जी के प्रवचन सुन कर तो देखे। क्या पता कोई काम की बात निकल ही जाये। दुकान नौकरों के हवाले करके उस गाँव चल दिया, जहाँ महात्मा जी विराजमान थे। महात्मा जी के प्रवचन चल रहे थे। हरदयाल भी सुनने बैठ गया। हरदयाल से रहा नहीं गया।

पास में बैठे श्रद्धालु से हरदवाल ने चुपके से कहा, ‘महात्मा जी तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन सोने की जूती सिर पर नहीं खायी जाती।’ हरदयाल की बात पर श्रद्धालु को गुस्सा आ गया और उसने अपनी जूती उठा कर हरदयाल के सिर पर मार दी।

सभा में हड़कम्प मच गया। महात्मा जी को जब सारी बात समझ में आयी, तो उनहोंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘हरदयाल का कहना सही है, उसे कोई पाँव में पहनता नहीं तो सिर पर खाने की नौबत भी नहीं आती।

लेकिन हर बात को सोने की जूती समझ कर खारिज कर देना भी मुर्खता है, क्या पता उसे सिर पर खाना ही पड़ जाये।’ हरदयाल समझ गया कि सोने की जूती तो नहीं खायी जाती लेकिन बिना सोचे-समझे बोलने के कारण व्यवहार में चमड़े की जूती खानी पड़ सकती है।

निठल्ले को कोई सूख नहीं

सुमरेपुर गाँव में दीनानाथ नामक एक व्यक्ति रहता था। दीनानाथ हमेशा बड़ी जल्दबादी में रहता। जल्दी-जल्दी बोलता, जल्दी-जल्दी चलता और जल्दीबाजी में ही बात सुनता और कहता। दुकान पर भाई बैठते थे और घर पत्नी ने सम्भाल रखा था। फिर भी दीना को लगता कि दुनिया उसके भरोसे ही चल रही है। जब देखो, उसके मुँह से यही सुनने को मिलता, बहुत काम है।

एक दिन की बात है, दीना हड़बड़ाता हुआ तेजी से भागा जा रहा था। रास्ते में उसका पाँव किसी चीज से टकरा गया। देख-ती कोई नुकीला पत्थर धरती में धँसा हुआ था। दीना ने रास्ते के पत्थर को बुरा-भला सुनाते हुए कहा कि अगर मेरे पास समय होता, तो तुम्हें यहाँ से उखाड़ फेंकता। मैं जल्दी में हूँ, मुझे हजार काम हैं।

इतना कहने के साथ ही वह नजदीक के एक पेड़ के नीचे जाकर अधलेटा हो गया। यह दीना का खास शगल था। गाँव से जरा दूर आकर आराम फरमाना-और लोगों से कहना कि उसे बहुत काम है। दुकान तो वह कभी-कभार ही जाता था।

इतने में पास से गामूजी निकले। गामूजी बड़े मेहनती आदमी थे। दीना ने अपनी आराम फरमाने की चोरी पकड़े जाते देखकर बात को संभालते हुए गामूजी से कहा, ‘इस पत्थर से चोट लग गयी, तो तनिक किनारे आकर बैठा हूँ। ” गामूजी, पत्थर की ओर बढ़े ओर थोड़ी-सी मशक्कत के बाद उसे उखाड़ फेंका।

पत्थर हटने से हुए गड्ढ़े में एक कलश पड़ा था। जिसमें से स्वर्ण मुद्राएँ झाँक रही थी। गामूजी ने कलश बगल में दबाया और दीना को शुक्रिया कहते हुए निकल गया। गामूजी का एक काम दीना के हजार कामो पर भारी पड़ गया। दीना का निठल्लापन उसे ले डूबा। इसीलिए कहते हैं कि निठल्ले को कोई सूख नहीं।

आगे का लेखा किसने देखा

चम्पापुर नामक गाँव था। चम्पापुर में एक सेठ रहता था। सेठ की हवेली बहुत बड़ी थी। हवेली में कई नौकर-चाकर काम करते थे। सेठानी हमेशा गहनों से लदी-फदी रहती थी।

कहने को हर सुख था, लेकिन फिर भी सेठ-सेठानी दु:खी थे। उसकी काई सन्तान नहीं थी। दोनों के मन में पुत्र की बड़ी आस थी। सेठ का एक मुनीम था-घनश्याम। सेठ अकसर घनश्याम से कहते कि पुत्र के बिना कौन उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा। घनश्याम सेठ को ढाढ़स बँधाता लेकिन सेठ का दु:ख जाता ही नहीं था।

एक दिन की बात है। घनश्याम ने सेठजी से कहा कि नगर में एक फकीर आया है। लोग कहते हैं कि वह हर मुराद पूरी करता है। घनश्याम का इतना बोलना हुआ और सेठजी ने फकीर की सेवा में जाने की ठान ली। अगले ही रोज सेठ-सेठानी ने फकीर के सामने पहुँचकर अपना दुखड़ा रोया। फकीर पहुँचा हुआ था। उसने चिमटा फटकारा और एक दृश्य उभर आया। उन्होंने देखा कि उनके एक पुत्र हुआ है और वे बड़े प्रसन्न है।

फिर देखा कि पुत्र किशोर हो गया है और गलत संगत में फँस गया है। उनके पुत्र ने सेठ-सैठानी को कोठरी में बन्द कर दिया है। सेठ ने यह भी देखा कि वह पाई-पाई जोड़ा हुआ सारा धन जुए में हार चुका है। फिर देखा कि अत्यधिक मद्यपान करते हुए पुत्र कई बीमारियों से ग्रस्त होकर अपनी अन्तिम साँसें गिन रहा है। एक ही क्षण में जीवन के कई चित्र आँखों के आगे खिंच गये।

जैसे ही फकीर की माया टली, सेठ-सेठानी ने पूछा; क्या हमारे साथ सचमुच यही बीतने वाली थी? फकीर ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘आगे का लेखा किसने देखा? पुत्र की एक कल्पना तुम करते हो, पुत्र की एक कल्पना मैंने तुम्हें करवायी, दोनों ही झूठ भी है और सच भी।

अजाने भविष्य में क्या छिपा है कौन जानता है?” सेठ-सेठानी को बात समझ में आ गयी कि जो है, उसी में सुखी रहना चाहिए। जो नहीं है, वह सोच कर दु:खी रहना खुद को ही छलना है। ईश्वर जो भी करता है, अच्छे के लिए करता है।

मन का मौसम

एक किसान के चार बहुएँ थीं। चारों ही बहुत सुघड़ ओर सुशील थीं। एक दिन की बात है, किसान ने चारों को बुलाया और कहा, ‘मुझे एक बात तुम सभी से पूछनी है।

तुम सब मुझे एक-एक करके बताओ कि कौन-सा मौसम अच्छा होता है? पहली बहू ने कहा, “मुझे तो सर्दी का मौसम अच्छा लगता है, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने का मजा सर्दी के मौसम में ही है।’ दूसरी बहू ने कहा, ‘मुझे सर्दी की बजाय गरमी की ऋतु ज्यादा सुहाती हैं। खस-खस के पर्दों से भीनी-भीनी ठण्डी हवा आती रहती है, पीने को शीतल शरबत मिलता है।’

तीसरी बहू का कहना था, “मुझे बरसात का मौसम बहुत अच्छा लगता है। बारिश की बूँदों से तपते तन को राहत मिलती है, हर कहीं झूले लगे होते हैं, बादल तरह-तरह की आकृतियाँ बनाते हुए बरसाते हैं, मोर को नाचते हुए देखने का सुख ही अलग है।’ आखिर में सबसे छोटी बहू के बोलने का मौका आया। किसान ने कहा, ‘बहू! तुम भी बताओ, तुम्हें कोंन-सा मौसम अच्छा लगता हैं?”

छोटी बहु, बोली, “पित्ताजी! मुझे वह मौसम अच्छा लगता हैं, जिसमें मेरे हाथ आटे में सने रहें, सब गरम-गरम रोटी खाते रहें, बैलों को चारा-पानी मिलता रहे, गाय के बछड़े गाय से चिपट कर दूध पीतें रहे और घर के पुरुष सदस्य सुबह जायें ओर शाम को लौट आयें। सभी के पास काम हो

और सुख-शान्ति का वास हो’ चौथी बहू की बात सुनकर किसान ने प्रसन्न होते हुए कहा, ‘तुम्हारी बात सही है, मौसम आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन सबसे जरूरी बात यही है कि घर का माहौल अच्छा बना रहे, वही मौसम सबसे प्यारा होता हैं, सच भी है सब मिल-जुल कर रहें और सुख शान्ति बनी रहे, तभी कोई मौसम मन को भाता है।

गुण का मोल

एक गाँव था। गाँव में दो बहनें रहती थी। रमकू औंर झमकू। रमकू सामान्य रंग-रूप की थी, वहीं झमकू बहुत खूबसूरत थी। लेकिन अपने रंगरूप पर झमकू को बहुत घमण्ड था। रमकू चार लोगों के बीच आसानी से रम जाती वहीं झमकू नाक-भौंह सिकोड़ती ओर सबसे अलग-थलग ही रहती।

रमकू सबकी चहेती थी, यह बात रूपवती झमकू को अखरती रहती। एक दिन उनके घर एक अतिधि आया। रमकू किसी के बिना कहे उनकी आवभगत में लग गयी। वहीं झमकू ने आये मेहमान को पानी पिलाना तो दूर उनके लिए आदरभाव तक नहीं दिखाया। उसने झल्लाते हुए अपनी माँ से कहा कि जिसे देखो मुँह उठाये चला आता है।

नौजवान अतिथि को यह बात अखर गयी और वह बिना कुछ कहे उठकर जाने लगा। इतने पर भी झनकू की जबान चुप नहीं हुई, उसने जाते आदमी से कहा, ‘अपना झोली-डण्डा तो लेते जाओ।’ कुछ दिनों बाद ही राजा के दूत कई तरह के थाल सजाये और मंगलगान करते हुए उनके घर पहुँच गये।

पता चला कि रोज झनकू के रूप-सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर खुद राजकुमार झमकू से मिलने पहुँचा था ताकि उससे उससे रचा सके। लेकिन झमकू की गजभर लम्बी जुबान और घमण्ड के कारण उसने रमकू से ब्याह करना तय कर लिया जो गुणों की खान थी। सो रमकू का राजकूमार से विवाह हो गया और झमकू हाथ मलती रह गयी।

दामाद की ‘हाँ- ना’

ब्याह के बाद पहली बार भोलू पत्नी को लेकर ससुराल गया। किसी ने उसे सीख देते हुए कहा कि पहली बार ससुराल जा रहे हो, ज्यादा बोलना मत। ससुराल में ज्यादा बोलने से इज्जत कम होती है। दामाद की तरह एक बार ‘हाँ’ ओर एक बार ‘ना’ से काम चलाना। सीख को गाँठ बाँध कर भोलू ससुराल पहुँच गया। ससुराल में भोलू की खूब आवभगत हुई।

सास ने भोलू से पूछा कि रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई? भोलू ने कहा ‘हाँ’। ‘समधी जी का स्वास्थ्य तो ठीक है? ससुर के सवाल पर भालू ने ‘ना’ में गर्दन हिला दी। ‘मेरी बेटी से कोई भूल तो नहीं हुई? सास ने कहा और भोलू ने अपनी बारी के अनुसार ‘हाँ’ का इशारा कर दिया।

‘वह सबका ख्याल तो रखती है?’- सास ने कहा भालू का जवाब ‘ना’ में था। ‘आप इसे पीटते तो नहीं? लड़की के भाई ने गुस्से से पूछा ओर भोलू ने ‘हाँ’ में गर्दन हिला दी। ‘तो अब आप इसे अपने साथ वापस नहीं ले जायेंगे.” सास घबरायी और भोलू ने ‘ना’ का इशारा कर दिया।

यह देखते ही सुसराल में रोना-पीटना मच गया। साले ने बाहें चढ़ा लीं और पत्नी ने भी रूठ कर फिर वापस ना जाने का इरादा कर लिया। बात बढ़ती देख भोलू ने सारी बात खुलकर बतायी और आगे से किसी भी सलाह को बिना सोचे-समझे मानने से तौबा कर ली।

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