पंचतंत्र की कहानियाँ short story in hindi

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पंचतंत्र की कहानियाँ short story in hindi दोस्तों आज हम बच्चो के लिए कुछ इंटरेस्टिंग पंचतंत्र की कहानियाँ लेकर आये है। ये Short कहानिया आपको आपके क्लास होम वर्क में भी बहुत मदद करेंगी।

प्रजा की बोली | पंचतंत्र की कहानियाँ short story

राजा शुद्धोधन के एक सुपुत्र था, प्रसन्नजीत। प्रसन्नजीत बड़ा ही आज्ञाकारी था। पिता के कहे को पत्थर की लकीर मानने वाला। एक बार राजा ने युवा होते अपने पुत्र से कहा, ‘पुत्र मैं चाहता हूँ कि तुम प्रजा के बीच अपनी पहचान छुपकर रहो।

तुम्हें अपनी चाल-ढाल से लेकर हावभाव सब साधारण नागरिकों जैसे रखने हैं। ऐसा तुम्हें कई सालों तक करना है। मैं चाहता हूँ कि तुम प्रजा की बोली भी सीखो। ” बोली सीखने के लिए प्रजा के बीच रहने की बात प्रसन्नजीत को समझ में नहीं आयी, लेकिन पिता का कहा टालने का तो प्रश्न ही नहीं था।

प्रसन्नजीत को प्रजा के बीच साधारण वेश में रहते कई साल हो गये। एक दिण प्रसन्नजीत राजमहल आया तो उसकी वेशभूषा और भाषा-ओली से द्वारपाल भी धोखा खा गये। किसी तरह उसकी अपने पिता से मुलाकात सम्भव हुई। राजा ने उसे गले से लगा लिया।

अपने लक्ष्य में सफल होने के बाद प्रसन्नजीत ने अपने पिता से क्षमायाचना सहित यह सवाल किया कि आखिर क्यों जनता की बोली सीखने के लिए उसे इतने सालों तक जनता के बीच रहना पड़ा, जबकि यह काम तो उसके लिए कोई शिक्षक भी कर सकता था।

शुद्धोधान ने जवाब दिया, ‘प्रजा की बोली भले ही तुम्हें राजमहल में कोई शिक्षक सिखा देता लेकिन इस बोली में अभिव्यक्त होते प्रजा के सुख-दु:ख को तुम तब तक महसूस नहीं कर पाते, जब तक तुमने उनके बीच रहना नहीं सीखा होता।

अब तुम सही मायने में ‘प्रजा की बोली’ सीख गये हो।’ अगले ही दिन प्रसन्नजीत का राजतिलक कर दिया गया। प्रजा उसके राज में बहुत सुखी थी।

किसी से नहीं कहना

गाँव में एक स्त्री थी। नाम था रामप्यारी। रामप्यारी बड़ी वाचाल औरत थी। उसके पाँवों में चक्कर लगा हुआ था। अपने घर में तो वह टिकती ही नहीं थी। जब तक वह इस घर की बातें उस घर को नहीं बता देती, खाना उसके पेट में हजम नहीं होता था।

उसका हर वाक्य इन शब्दों के साथ शुरू होता, ‘लोग कह रहे थे. ..’ या “मैंने तो सुना है…’ आखिर में वह यह कहना नहीं भूलती, “…किसी से नहीं कहना’। नमक-मिर्च लगाकर वह बात को कहाँ से कहाँ पहुंचा देती। एक दिन ऐसे ही वह पड़ोसी के घर पहुँच गयी।

उस घर में नयी-नयी शादी हुई थी। उसने नयी बहू से कहा, ‘सुना है कि तुम घर के काम ठीक से नहीं जानती।’ बहू से सपकपाते हुए पूछा, ‘आपने किससे सुना है।’ रामप्यारी ने कहा” ‘तुम्हारी सास किसी से कह रही थी, लेकिन तुम किसी से कहना नहीं कि मैंने तुम्हें यह बात बतायी हैं।’

नयी बहू बड़ी चतुर थी, वह समझ गयी कि उसकी सास तो बहुत सीधे स्वभाव की है। रामप्यारी सास-बहू में झगड़ा करवाने में तुली है। उसने रामप्यारी से कहा, ‘मैंने सुना है कि गाँव में एक औरत है, जो हर किसी का झगड़ा करवाने पर तुली रहती है।’ अब सकपकाने की बारी रामप्यारी की थी। ‘लोग कह रहे थे कि उस औरत का नाम ‘रामप्यारी’ है।’ नयी बहू आगे बोली।

रामप्यारी के मुँह से कोई बोल नहीं फूटा। उसने चुपचाप वहाँ से खिसक जाने में ही भलाई समझी। जाते-जाते उसने सुना, पीछे से नई बहू कह रही थी, ‘मैंने तो आपसे कह दी है लेकिन आप किसी से नहीं कहना…’ रामप्यारी ने जाते-जाते कहा, ‘नहीं बहू मैं किसी से नहीं कहूँगी लेकिन तुम भी रामप्यारी की बात किसी से नहीं कहना।’ उस दिन के बाद से रामप्यारी सचमुच सुधर गयी।

राँका और बाँका

राँका और बाँका ईश्वर-परायण दम्पति थे। वे ईश्वर के बड़े भक्त थे। सादगी और सरलता से अपना जीवनयापन करते थे। वे लोभ लालच और आसक्ति से ऊपर उठे हुए थे।

एक बार विधाता ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी। एक दिन वे दोनों जंगल में लकड़ी लेने के लिए जा रहे थे। पति आगे चल रहा था ओर पत्नी पीछे चल रही धी। रास्ते में मिट्टी के ढेर पर राँका को ठोकर लगी। उसने देखा-मिट्टी के ढेर से सोने की मोहरों से भरी एक थैली बाहर आकर पड़ी है।

थैली खुल गयी। चारों और सोना ही सोना बिखर गया। चमचमाते सोने को देखकर राँका जल्दी से धूल डाल कर उसे ढँकने में लगा। इतने में बाँका आ पहुँची। उसने पति से पूछा, ‘आप क्या कर रहे हैं? राँका ने पहले तो कुछ नहीं बताया। पर ज्यादा जिद करने पर उसे कहना पड़ा, ‘सोने की मोहरें थीं। मैंने समझा, इन पर कहीं तुम्हारा मन न चल जाये, इसलिए इन्हें धूल डालकर ढँक रहा था।’

बाँका ने हँस कर कहा, ‘वाह, धुल डालने से क्या लाभ हैं? मैं तो सोने को पीली मिट्टी से ज्यादा महत्व नहीं देती। आप अभी तक इस पीली मिट्टी को सोना मानते हो। मिट्टी चाहे काली ही या पीली, मिट्टी तो मिट्टी ही होती है। इसलिए मिट्टी पर मिट्टी डालने से क्या फायदा।’ राँका समझ चुका था कि उसकी पत्नी लोभ लालच से बहुत दूर है।

लालच का पिशाच

दो भाई ऊँटों पर सवार होकर धन कमाने के लिए परदेश जा रहे थे। दोनों बड़े खुश थे कि खूब धन कमाकर लायेंगे और आनन्द से जीवन व्यतीत करेंगें। जब वे काफी दूर निकल गये, तो उन्होंने देखा कि एक बुढ़ा आदमी दौड़ा आ रहा है। पास आकर उसने दोनों भाइयों से कहा, “तुम लोग आगे मत जाना। वहाँ बड़ा भयानक पिशाच बैठा है। वह तुम्हें खा जायेगा।’

इतना कहकर वह आदमी जैसे दौड़ता हुआ आया, वैसे ही दौड़ते हुम वापस चला गया। उन भाइयों ने सोचा कि बेचारा बुड्ढ़ा था और अकेला था। कुछ देखकर डर गया होगा। हम तो दो हैं जोर जवान हैं। डरने की क्या बात हैं? यह सोचकर दोनों भाई आगे बढ़े।

थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्होंने देखा, रास्ते में एक थैली पड़ी है। उन्होंने ऊँटों पर से उतरकर थैली को उठाया। उसमें सोने की मोहरें थी। दोनों ने इधर-उधर निगाह दौड़ायी, वहाँ कोई भी नहीं था। प्रसन्न होकर बड़ा बड़बड़ाया, हमारा काम बन गया।

परदेस जाने की अब जरूरत नहीं रही। पता नहीं, जाने क्यो बुड्ढ़े का दिमाग फिर गया। दोनों को भूख लगी थी। बड़े भाई ने कहा, ‘जाओ, पास के गाँव से कुछ खाना ले आओ।’ छोटे भाई के जाते ही बड़े भाई के मन में विचार आया कि कुछ ही समय में मोहरे आधी-आधी बँट जायेंगी। उसने अपनी बन्दूक की ओर देखा।

भाई के आने पर यदि वह उसे गोली से उड़ा दे, तो सारी मोहरें उसकी हो जायेंगी। उसने अपना विचार पक्का कर लिया। उधर छोटे भाई ने गाँव की ओर जाते हुए सोचा- उसका बड़ा भाई आधी मोहरें तो जायेगा। यदि वह खाने में विष मिला दे, तो पता भी नहीं चलेगा और भाई से छुटकारा भी मिल जायेगा।

बात उसके मन को जम गयी। थोड़ी देर में वह खाने का सामान लेकर लौटा तो बड़े भाई ने दूर से ही उस पर गोली दाग दी। छोटा भाई वहीं ढेर हो गया। बड़े भाई को बड़े जोर की भूख लगी थी।

उसने सोचा कि पहले खाना खा लूँ, तब गड्ढा खोदकर भाई को उसमें गाड़ दूँगा। खाना उठाया और ज्योंही पहला ग्रास मुँह में रखा कि उसे चक्कर आया और देखते-देखते उसकी जीवनलीला समाप्त हो गयी। बुड्ढे की बात सच निकली। लालच का पिशाच दोनों भाइयों को खा गया था।

प्रकाश की किरण

किसी नगर में एक लालची व्यक्ति धनीराम रहता था। उसका अपनी पत्नी-बच्चों से तनिक भी प्रेम नहीं था। वह रात-दिन इसी उधेड़बुन में रहता था कि किस प्रकार उसके धन में वृद्धि हो। ‘धीरे-धीरे धनीराम के पास अपार धन हो गया। उसे वह कहाँ रखे? काफी सोच-विचार के बाद उसने पैसे को कलशों में भरा और धरती में गाड़ दिया। उसे डर था कि कहीं उसके लड़के उस पैसे को उड़ा न दें।

एक दिन एक साधु तीर्थयात्रा करते हुए धनीराम के यहाँ आये। बड़ी अनिच्छा के साथ उसने साधु को अपने यहाँ ठहरा लिया सोचा, साधु उसे ऐसा कोई मन्त्र दे देंगे, जिससे उसका धन कई गुना बढ़ जायेगा। अपना मनोरथ पुरा करने के लिए उसने साधु की खातिर की, उन्हें खिलाया-पिलाया, उनके पैर दबाये। उसकी स्त्री अच्छे स्वभाव की थी। साधु की आवभगत में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी।

सेवा से प्रसन्न होकर साधु ने कहा, ‘वत्स पैसे को ‘द्रव’ कहते हैं। द्रव यानी बहता हुआ पदार्थ। पैसे का आते-जाते रहना ही अच्छा है। संत कबीर ने कहा है कि नाव में अगर पानी भर रहा हो तो उसे दोनों हाथों से उलिचते रहना चाहिए। इससे नाव डूबती नहीं है। यहीं बात धन के साथ है।

घर में धन बढ़े तो उसे भी निकालते रहना चाहिए।’ फिर कुछ रुककर उन्होंने कहा, ‘मुझे ही देखो, मैं एक बढ़े सेठ का बेटा हूँ। मेरे घर में खूब धन दौलत थी, पर मुझे लगा कि धन से भी बढ़कर कुछ है। मैंने सब कुछ त्यागा और मुक्ति के मार्ग पर निकल पड़ा। कितना आनन्द है, इस जीवन में! न किसी तरह का लोभ-लालच, न चिन्ता!’

उसी क्षण धनीराम के अन्तर में प्रकाश की एक किरण फूटी। लालच का अन्धकार दूर हो गया और धनीराम के जीवन की दिशा बदल गयी।

एक सेर धान

एक नगर में अत्यन्त समृद्ध सेठ रहता था, ‘जानकीदास’। उसके एक बेटी थी- ‘रूपवती’। वह विवाह योग्य हो चुकी थी। उसने अपने विवाह के लिए एक शर्त रखी कि जो युवक कीचड़ से भरे तालाब में डुबकी लगाने के बाद एक गिलास पानी से अपने शरीर को साफ कर लेगा, वह उसी से विवाह करेगी। एक भी युवक इस शर्त पर खरा नहीं उतर सका।

यह देखकर सेठ को रूपवती के विवाह की चिंता सताने लगी। एक दिन ‘मोहन’ नामक साधारण युवक इस शर्त को पूरी करने के लिए आया। उसने कीचड़ से भरे तालाब में डुबकी लगायी और धूप में खड़ा हो गया। थोडी देर बाद कीचड़ सूखकर महीन धूल में परिवर्तित हो गया। उसने रगड़कर कीचड़ को अपने शरीर से उतार दिया और एक गिलास पानी में हाथ-मुँह साफ कर लिये।

उसकी बुद्धिमानी देखकर रूपवती ने उससे विवाह करने की स्वीकृति दे दी। परन्तु मोहन ने कहा, ‘रूपवती को भी मेरी एक शर्त पूरी करनी होगी। यदि वह उसमें सफल होती है, तभी में उसे विवाह करूंगा।’ मोहन ने उसे एक सेर धान देते हुए कहा, “क्या तुम इस धान से मुझे छप्पन भोग बनाकर खिला सकती हो? रूपवती ने कहा, हाँ, लेकिन इसके लिए मुझे एक वर्ष का समय चाहिए।’

एक वर्ष बीतने के बाद मोहन रूपवती के पास पहुँचा। रूपवती ने उसके सामने छप्पन भोग परोसे। यह देखकर मोहन ने पूछा, ‘एक सेर धान से तुमने इतने सारे पकवान कैसे बनाये?’ रूपवती ने कहा, ‘मैंने एक सेर धान की बुवाई करवा दी। फसल होने पर उसे बेच दी और पकवान बनाये है।’ रूपवती की चतुराई देखकर मोहन ने भी विवाह के लिए हाँ कर दी और खुशी-खुशी दोनों का विवाह हो गया।

अपनी कमाई का सुख

सेठ लक्खूमल अपने पीछे इतना धन छोड़ गये कि सात पीढियाँ खायें, तो भी कम न पड़े। उसके सात बेटे थे और सात ही बहुएँ थी। घर में रोज अच्छा भोजन बनता और सब साथ खाते। भोजन के बाद सासूजी सभी बहुओं से पूछती कि जी-भर के खाया कि नहीं? सबसे छोटी बहू कहती कि खाया तो था लेकिन बासी था।

सेठानी समझ नहीं पाती कि जहाँ सारी बहुएँ तो कहती है कि हमारे धनभाग तो इतना अच्छा खाने को मिलता है, वहीं छोटी बहू कहती है कि बासी खाया। इसी तरह जब सबके लिए नये वस्त्र आते, तो सब उन्हें अच्छा बतातीं, लेकिन छोटी बहू कहती कि हम तो पुराना कपड़ा पहनते है।

एक दिन सेठानी ने सभी के सामने छोटी बहू से पूछा-‘तुम्हें क्या कमी है? तुम ऐसा क्यों कहती हो कि बासी खाया-पुराना पहना।’ बहू ने कहा, ‘हमारे पास अपने पूर्वजों का कमाया दुआ धन है, उसी से खाना आता है और उसी से कपड़े बनते हैं।

आपके सातों बेटे निठल्ले हैं, कोई काम नहीं करते। यही कारण है कि हम जो भी खाते-पहनते हैं, वह सात पीढी पुराना है और बासी है।’ इतना सुनते ही सब सन्न रह गये लेकिन सेठानी को बात समझ में आ गयी थी।

उसने अपने सातों बेटों से कहा’ ‘छोटी बहू सही कहती है। पति का कमाया टका ही बढ़िया, बाप-दादाओं का लाख भी बेकार। फिर खर्चा करने से तो कुबेर का कोश भी खाली होगा।’ सेठानी ने उसी दिन अपना भण्डार गरीबों के लिए खोल दिया। सातों बेटे कमाने लगे। सातों की कमाई ने फिर से भण्डार भर दिये। घर फिर पहले की तरह हरा-भरा हो गया। अपनी कमाई का सुख ही अलग है।

बुरे कर अन्त बुरा

एक गाँव में दो मित्र रहते थे- राकेश और सूरज। सूरज सबकी मदद करता था, तो राकेश सबका मन दुखाता रहता था। एक दिन राकेश ने सूरज से कहा, ‘मित्र! मेरे साथ शहर चल, वहाँ हम धन कमाने के साथ घूम भी लेंगें और जो धन कमायेंगे वह आधा-आधा बाँट लेंगे। सूरज उसकी बातों में आ गया। वे दोनों निकल पड़े।

शहर जाकर राकेश ने सूरज की बुद्धि और मेहनत से बहुत-सा धन कमाया। जाब काफी धन इकट्ठा हो गया, तो एक दिन वे अपने गाँव की तरफ रवाना हो गये।

रास्ते में राकेश ने सोचा क्यूँ ना में सूरज को ठग लूँ। उसे एक उपाय सूझा। जब वे दोनों एक गाँव में पहुँचे, तो राकेश ने कहा, क्यों न हम इसे कहीं गाड़ दें? जब भी जरूरत पड़ेगी वहाँ से ले जाया करेंगे।’ सूरज को राकेश की बात सही लगी।

उन दोनों ने सारा धन वहीं एक पेड़ के नीचे गाड़ दिया और उस पर निशान बना दिया। कुछ दिनों बाद राकेश धन वाली जगह पर गया और सारा धन निकालकर उसके स्थान पर मिट्टी के ढेले भर दिये।

तीन-चार दिन बाद उसने सूरज से कहा, ‘मित्र, चलो उस जगह जाकर थोड़ा धन ले आते हैं।’ उन दोनों ने धन वाली जगह को खोदना शुरू किया। लेकिन वहाँ धन नहीं था। यह देखकर राकेश बोला, सूरज! तूने सारा धन निकाल लिया है। ” राकेश की बात सुनकर सूरज को गुस्सा आ गया। वह बोला, ‘मैंने यह धन नहीं लिया है।

मैंने आज तक किसी के साथ बेईमानी नहीं की। यह धन तूने ही चुराया है।’ दोनों लड़ते हुए सरपंच के पास पहुँचे और सारी बात सरपंच को कह सुनायी। राकेश ने सरपंच से कहा- ‘सरपंच जी वह पेड़ बोलता है। हम उससे पूछेंगे तो वह हमें चोर का नाम बता देगा। ‘

राकेश दौड़ता हुआ अपने घर पहुँचा ओर अपने पिता को सारी बात समझा दी। अगले दिन उसने पिता को पेड़ की खोखर में बैठा दिया। राकेश और सूरज सरपंच के साथ जब उस पेड़ के पास गये और चोर का नाम पूछा, तो खोखर में छिपे राकेश के पिता ने सूरज का नाम ले दिया। सरपंच ने सूरज को कठोर कारावास की सजा देने का निर्णय लिया।

सूरज ने कहा, ‘मुझे दण्ड स्वीकार है। बस, मैं इस पेड़ में आग लगाना चाहता हूँ।’ सरपंच की इजाजत से सूरज ने पेड़ के चारों ओर आग लगा दी। थोड़ी देर में राकेश का पिता चिल्लाया, ‘अरे, मुझे बचाओ।’ जैसे-तैसे पिता को बाहर निकाला गया। सारी सच्चाई सरपंच के सामने आ चुकी थी। बेईमानी करने के अपराध में राकेश को कठोर कारावास की सजा मिली और सूरज को सारा धन सौंप दिया गया।

कायाकल्प

एक सेठ था। उसके पास धन-दौलत, नौकर-चाकर किसी चीज की कमी नहीं थी। सेठ अपनी धन-दौलत के अनुसार खूब दान-पुण्य भी करता था। चारों ओर उसका नाम था।

एक दिन एक महात्मा से उसकी भेंट हो गयी। महात्मा के पास तन ढँकने के लिए गिने-चुने कपड़े ही थे। सेठ ने उन्हें कुछ कपड़े देने चाहे। महात्मा ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया। वे बोले, ‘मैं केवल वे चीजें रखता हूँ जिनके बिना मेरा काम नहीं चलता। मेरे पास कपड़े हैं। जब नहीं रहेंगे, तो ईश्वर अपने आप दे देगा।’

सेठ बोला, ‘ले लीजिए! किसी जरूरतमन्द को दे दीजिएगा। क्योंकि आपके पास तो ऐसे लोग आते ही रहते होंगे।’ महात्मा ने कहा, ‘यह तो कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है कि पहले आवश्यकता से अधिक चीजें इकट्ठी करो और फिर दान करो। ‘ सेठ बहुत समझदार था। वह महात्मा की बात के पीछे छिपे मर्म को समझ गया था। बोला, ‘महाराज! आप ठीक कहते हैं। ईश्वर सबको देता है।’

अवरुद्ध कण्ठ से सेठ ने आगे कहा, “स्वामीजी! आप बडे त्यागी हैं। आपका जीवन धन्य है।’ महात्मा ने तत्काल कहा, “सेठा मुझसे अधिक त्यागी तो तुम हो। मैंने तो दुनियादारी की चीजें त्यागी हैं, लेकिन असली त्यागी तो तुम हो, जिसने नाशवान चीजों को पकड़ रखा है और सनातन, अविनाशी चीजों को छोड़ दिया है।” महात्मा की बात ने सेठ के जीवन का कायाकल्प कर दिया था।

चटोरी नौकरानी

एक जमींदार था। उसने एक नौकरानी को काम पर रख लिया। वह नौकरानी जमींदार के घर सारे काम किया करती थी। लेकिन उसमें एक बुराई थी कि वह चटोरी बहुत थी। एक दिन जमींदार ने उसकी चटोरेपन की आदत से तंग होकर कहा, ‘यदि आज के बाद मैंने तुम्हें चीजें चोरी करके खाते देखा, तो नौकरी से निकाल दूँगा।’ नौकरी जाने के डर से वह सम्भत्न गयी।

एक दिन जमींदार का मित्र शंकरलाल आने वाला था। जमींदार उसके लिए अच्छी किस्म का एक आम ले आया। उसने नौकरानी को बुलाया ओर कहा ‘आम का छिलका उतारकर इसे टुकड़ों में काट दो। दोनों दोस्त मिलकर इसे खायेंगे।’

नौकरानी को आम बहुत पसन्द थे। चखते-चखते आम खत्म हो गया। इतने में जमींदार की आवाज सुनायी दी। आम काट कर ले आ। उसे अपनी नौकरी जाने की चिंता सताने लगी। उसने जमींदार से कहा, ‘मालिका चाकू की धार कम हो गयी है। इससे आम का बारीक छिलका उतर नहीं रहा है।

जमींदार चाकू में धार लगाने लगा। इतने में दरवाजे पर शंकरलाल आ पहुँचा। नौकरानी उससे बोली, ‘लगता है मालिक तुमसे नाराज हैं। चाकू की धार बनाते-बनाते बुदबुदा रहे थे कि आज तो शंकरलाल की नाक काट दूँगा।

नौकरानी की बात सुनकर जब शंकरलाल ने भीतर झाँककर देखा, तो वाकई जमींदार चाकू की धार तेज कर रहा था। यह देखकर शंकरलाल सिर पर पाँव रखकर भागा। उधर नौकरानी ने जमींदार से कहा, “आपका दोस्त मेरे हाथ से जाम छीनकर भाग गया है। ‘ जमींदार हाथ में चाकू लिये शंकरलाल के पीछे दौड़ा। ।

वह दौड़ता हुए चिल्ला रहा था, ‘अरे रुक जा, कम से कम आधा आम तो काट कर दे जा।’ शंकरलाल ने सोचा वह उसकी आधी नाक माँग रहा हैं। वह और तेज दौड़ने लगा। अन्त में थक-हार कर जमींदार घर लौट आया। आम का राज नहीं खुला और नौकरानी आम का मजा लेकर अगली चोरी में जुट गयी।

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