वातरोग – कारण,लक्षण,उपाय

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वातरोग का कारण: मस्तिष्क की सप्तम नाड़ी जिसकी शाखाएं चेहरे पर फैली होती हैं, में विकृति के कारण वातरोग होता है इस रोग को अर्दित रोग भी कहा जाता है।

मस्तिष्क में रक्तस्त्राव या धमनी में अवरोध या सर्दी आदि कारणों से नाड़ी में सूजन हो जाने के कारण सप्तम नाड़ी में विकृति आने से यह रोग होता है।

वातरोग का लक्षण

यह रोग अचानक शुरू होता है। कभी-कभी इसके होने से पहले कान के नीचे दर्द होता है। रोग के आक्रमण से आधा चेहरा भावहीन हो जाता है और ऐसा लगता है कि मांसपेशियों में शक्ति नहीं है।

चेहरा एक ओर को अकड़ा हुआ अनुभव होता है। होंठ पूरी तरह बंद नहीं होते, जिससे पिया हुआ द्रव बाहर निकलने लगता है। उस ओर की आंख की पलकें भी पूरी तरह बंद नहीं होतीं। रोगी साफ नहीं बोल पाता। जीभ में एक ओर स्वाद का भी पता नहीं चल पाता। रोगी का चेहरा एक ओर को (रोग से प्रभावित दिशा से विपरीत दिशा में) घूमा या खिंचा हुआ महसूस होता है।

वातरोग का घरेलू उपाय

रोगी को फुटबॉल के अंदर रहने वाला रबड़ का ब्लैडर फुलाते रहना चाहिए, जिससे मांसपेशियों व नाड़ी को क्रियाशील होने में सहायता मिले।

बच व सोंठ समान मात्रा में कूट-पीसकर छान लें। एक-एक ग्राम दवा शहद के साथ सुबह-शाम चटाएं।

शुद्ध कुचले का चूर्ण 125 मि.ग्रा. की मात्रा में आधी चम्मच शहद में मिलाकर सुबह-शान चटाएं व ऊपर से गर्म दूध पिला दें।

सन के बीज बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। दो-दो चम्मच सुबह-शाम शहद में मिलाकर दें।

10 ग्राम लहसुन पीसकर सुबह खाली पेट मक्खन के साथ दें।

अलसी व तिल बराबर मात्रा में पीसकर लुगदी बनाएं, उसमें नमक व सरसों का तेल मिलाकर लेप बनाएं व गर्म-गर्म कानों के नीचे बांधें। एक सप्ताह बाद सैन्धवादि तेल या महानारायण तेल की मालिश करें।

मल्ल सिंदूर व महागंधक योग 125 मि.ग्रा. प्रत्येक मिलाकर सुबह-शाम शहद साथ दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

कंटकार्यादिक्वाथ, महायोगराज गुग्गुल व शतावरी घृत का प्रयोग किया जाता है। साथ ही षड्बिन्दु तेल, अणु तेल या माष तेल का नस्य देने का विधान भी है।

वातरोग – कारण,लक्षण,उपाय

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