पानी के बारे में रोचक जानकारी

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पानी के बारे में रोचक जानकारी: पानी हमारे सब प्रकाऱ के आहारों में सम्मिलित रहता है, फिर भी हमको अपने शरीर की सफाई के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होती है। पानी पीने से न केवल हमारे आंतरिक अवयव स्वच्छ रहते हैं, बल्कि उनमें ताजगी भी बनी रहती है।

जल ही जीवन है

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मनुष्य बिना भोजन के 40 दिनो तक जीवित ‘रह सकता है, लेकिन पानी के बिना 7 दिन से अधिक नहीं। यह हमारे शरीर में पाया जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है। औसतन एक वयस्क व्यक्ति के शरीर में 35 से 50 लीटर तक पानी रहता है पानी उसके स्वयं के भार का 60 से 75 प्रतिशत।

शरीर में कितना पानी

हमारे शरीर के खून में 60 प्रतिशत, मस्तिष्क में 84 प्रतिशत, मांसपेशियों में 77 प्रतिशत, यकृत में 73 प्रतिशत, कार्टिलेज में 67 प्रतिशत, हड्डी में 22 प्रतिशत और वसा में 15 प्रतिशत पानी की मात्रा होती है।

उसी प्रकार हमारे शरीर से प्रतिदिन प्राय: 3 लीटर पानी खर्च होता है। इस प्रकार शरीर से बहार निकलने वाले पानी की पूर्ति कुछ मात्रा में भोजन में रहने वाले जलांश के द्वारा पूरी हो जाती है, फिर भी शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने के लिए ढाई से तीन लीटर यानी 8 से 10 गिलास पानी 24 घंटे में अवश्य पीना चाहिए।

पानी का महत्त्व

पानी शरीर में पहुच कर मल की धुलाई करता है, शरीर को फुर्तीला बनाता है, शरीर की नमी का संतुलन बनाए रखते हुए उसकी अत्यधिक गर्मी को शांत करता है, भोजन के आवश्यक पोषक तत्वों को घोल कर उन्हें शोषण योग्य बनाता है।

अनावश्यक शारीरिक पदार्थों को मल, मूत्र और पसीने के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल कर शरीर का तापमान बनाए रखता है। पानी से खून तरल बना रहता है, जिससे हर कोशिका तक पोषण तत्व बराबर पहुंचता रहता है। पानी की कमी से मल सूखा होने लगता है कब्जियत को जाती है।

मूत्र पीला और जलन के साथ आने लगता है। उलटी, दस्त से जब शरीर में पानी की कमी हो जाती है, तो निर्जलन (डिहाइड्रेशन) के कारण व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

बुखार, लू लगने पर, सूजाक जैसी पेशाब संबंधी बीमारियां होने रक्तचाप, ह्रदय की धड़कन, कब्ज, पेट की जलन जैसी तकलीफों में सामान्य स्थिति की अपेक्षा अधिक पानी पीना लाभदायक होता है।

पानी कब पिएं

वैसे तो पानी पीने का सबसे अच्छा मौका वही होता है, जब प्यास लगी हो, लेकिन कुछ नियमो के अनुसार किया गया सेवन अधिक लाभकारी होता है। पानी को एकदम से एक सांस में नहीं पीना चाहिए बल्कि घूंट-घूंटकर इस तरह पीना चाहिए कि वह मुंह में कुछ क्षण रुका रहे, ताकि उसका तापमान मुंह के बराबर हो जाए और जीभ आदि ग्रंथियों से निकलने वाले स्रावों का उसमें समावेश हो जाए।

उषा-पान बहुत गुणकारी होता है। सवेरे सोकर उठने के बाद कुल्ला, मंजन आदि करके रात का तांबे के लोटे में रखा पानी एक से दो गिलास पिएं। यदि संभव हो, तो उसमें एक कागजी नीबू निचोड़ कर पिएंगे तो अधिक गुणकारी होगा। इससे शौच खुलकर होगी और बवासीर जैसे कठिन रोग नहीं होंगे।

भोजन करने के आधा घंटा पूर्व एक गिलास पानी पीना गुणकारी होता है। इससे भूख अच्छी लगेगी। भोजन के बीच बहुत कम मात्रा में पानी पिया जा सकता है।

भोजन के अंत में भरपेट पानी पीने वालों की पाचन प्रणाली गड़बड़ा जाती है और इससे शरीर स्थूल भी होने लगता है। भोजन पचने के बाद पिया गया पानी शक्ति प्रदान करता है, इसीलिए भोजन करने के डेढ़-दो घंटे बाद एक-दो गिलास पानी पीना श्रेष्ठ माना गया है। जो लोग खाना खाने के तुरंत पहले पानी पी लेते है, उनकी पाचन क्रिया क्षीण हो जाती है।

निम्न स्थितियों में पिया गया पानी लाभ पहुंचाता है:

  • सोने से पूर्व पानी पीने से जहां नींद अच्छी आती है, वहीं भोजन ठीक से पचता है और स्वप्नदोष का भय नहीं रहता।
  • प्यास लगें या न लगे, लेकिन उपवास काल में पानी कई बार पीना चाहिए। इससे शरीर में संचित विष पेशाब के माध्यम से बाहर निकल जाता है।
  • तुरंत पानी पीकर गर्म चीजे जैसे चाय, कॅाफी, दूध न पिएं और तुरंत इन्हें पीने के बाद ऊपर से पानी न पिएं।
  • सोकर तुरंत उठते ही पानी न पिएं, क्योंकि इससे जुकाम, सिर दर्द तथा तबीयत भारी हो जाने का भय रहता है।
  • पेशाब करके तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए और न ही पानी पीकर तुरंत पेशाब करना चाहिए। इससे पाचन तंत्र तथा गुर्दे कमजोर पड़ सकते है।
  • पके फल जैसे ककड़ी, खीरा, तरबूज़ खाने के बाद और भोजन करने के पूर्व व तुरंत बाद पानी पीना हानिकारक होता है।
  • कठिन परिश्रम या व्यायाम करने के बाद, स्त्री-संसर्ग के बाद, धूप से ठंडे में आने के तुरंत बाद, चिकने और तले खाद्य पदार्थों के सेवन के बाद, भुनी मूंगफली खाने के तुरंत बाद मल त्याग के बाद पानी पीना सेहत के लिए ठीक नहीं होता।
  • नज़ला-जुकाम, फ्लू, खांसी, हिचकी पेट दर्द. लकवे की तकलीफ से पीड़ित व्यक्तियों को ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए।
  • गर्मी के दिनों में बर्फ का ठंडा पानी पीने के बजाय नए मटके का ठंडा पानी पिएं यह आपकी प्यास बुझाकर अधिक संतोष प्रदान करेंगा।

पानी द्वारा चिकित्सा

  • दर्द, सूजन, फोड़े-फुंसी गर्म-ठंडे पानी से सेकने पर ठीक हो जाते है। पहले तीन मिनट गर्म पानी को सेंक करें, फिर एक मिनट ठंडे पानी की। इस प्रकार दस मिनट तक सुबह-म दो बार सेंकने से आशातीत लाभ मिलता है।
  • दमा के दौरे में हाथ-पैर गर्म पानी में डुबोएं और रात में सोने से पूर्व गर्म पानी पिलाएं। दौरा पड़ने पर भी गर्म पानी ही पिलाना लाभप्रद होता है।
  • सिर पर ठंडा पानी डालने से नाक से खून आना बंद हो जाता है। गर्मी में ठंडे पानी से और सर्दी में गर्म पानी से पैर धोकर सोने से नींद अच्छी आती है।
  • ज्यादा चलने, ऊंचाई पर चढ़ने आदि से पैरों में आई थकान को दूर करने के लिए शाम को गर्म पानी में थोड़ा नमक डालकर पांच-दस मिनट डुबो कर रखें, सारी थकान दूर हो जाएगी।
  • पेट दर्द की शिकायत में गर्म पानी की थैली से सिंकाई करें, आराम मिलेगा। मसूढ़े फूलकर दर्द करते हो, तो गर्म पानी से कुल्ला करें। दांत दर्द में पहले दो मिनट सहनीय गर्म पानी मुंह में रखें, फिर बहुत ठंडा पानी दो मिनट रखें। इस क्रिया को चार-पांच बार दोहराने से दांत दर्द मिट जाएगा।
  • शरीर के किसी भी हिस्से के जल जाने पर तुरंत ही उस पर ठंडा पानी तब तक डालें, जब तक कि जलन समाप्त न हो जाए। बर्फ के पानी में जले हुए अंग को डुबा कर रखना और भी अधिक लाभदायक उपाय है। इस उपाय से न केवल शीघ्र आराम मिलेगा, बल्कि जले हुए का निशान भी नहीं पड़ेगा।
  • घाव चोट पर जब तक दवा उपलब्ध न हो, ठंडे पानी की पट्टी रखें। उसे गीला करते रहे। दिन में दो-तीन बार पट्टी बदल कर दोहराते रहने से छोटे घाव यूं ही ठीक हो जाते हैं।
  • तेज बुखार में ठंडे पानी को पट्टियां माथे पर रखने और बार-बार भिगो कर बदलते रहने से शरीर का तापक्रम कम हो जाता है।
  • पैरों में पसीना आने की बीमारी हो, तो पहले गर्म पानी में और फिर ठंडे पानी में क्रमश: पांच-पांच मिनट पैर रखने चाहिए। फिर बाद मेँ रगड़कर पोंछ लें और यह प्रयोग कम-से-कम हफ्ते भर करें।

इस तरह उपरोक्त प्रकार से जल चिकित्सा द्वारा अन्य शारीरिक विकारों को दूर किया जा सकता है।

दुनिया भर में केवल 75 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में तथा 40 प्रतिशत ग्रमीण क्षेत्रों में ही स्वच्छ पेय जल उपलब्ध है। अभी भी पृथ्वी पर 2 अरब लोग ऐसे हैं, जिनको पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। भारत में केवल 42 प्रतिशत लोगों को ही स्वच्छ पेय जल उपलब्ध है, जबकि स्वच्छता सबंधी सुविधाएं मात्र 20 प्रतिशत लोगों को ही प्राप्त हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार विकासशील देशों में अभी भी हर वर्ष 2 करोड़ 50 लाख लोग दूषित जल के कारण होने वाली बीमारियों की वजह से काल के ग्रास बनते हैं।

हमारे शरीर में जल सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला आवश्यक तत्व है। शरीर की हर कोशिका अपना कार्यं अच्छी तरह करने के लिए जल पर ही निर्भर है। एक व्यक्ति के शरीर में जल की मात्रा उसके भार के 60 से 75 प्रतिशत तक होती है।

दूषित होने के कारण

जल ऐसा तरल पदार्थ है, जिसमेँ बहुत से पदार्थ आसानी से घुल-मिल जाते हैं। अपने में मिलाकर घोल बना लेने की विशेषता के कारण जल शीघ्र ही दूषित हो जाता है।

जल में दो प्रकार की अशुद्धियां पाई जाती है, नहीं घुलने वाली और दूसरी घुलने वाली। न घुलने वाली अशुद्धियां वे है, जो पानी में मिल जाने पर उसमें घुलती नहीं। यदि पानी को थोड़ी देर हिलाया न जाए, तो ऐसी अशुद्धियों नीचे बैठ जाती है या ऊपर तैरती रहती है। इन्हें तीन भागों में बांटा जा सकता है-

  • वृक्षों के पत्ते, मिट्टी, रेत, लकड़ी का बुरादा। ये चीजे पानी में मिलकर उसे अशुद्ध बना देती हैं। ऐसे पदार्थ मनुष्य की आंतड़ियों में पहुंचकर रगड़ उत्पन्न करते हैं और दस्तों का कारण बनते हैं।
  • टायफाइड और हैजा आदि रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु। ये जीवाणु रोगी मनुष्यों के जल में स्नान करने, कपड़े या हाथ-मुंह गाने से जल में मिल जाते हैं। ऐसे जीवाणुओं से युक्त जल का प्रयोग करने वाले मनुष्य को भी वे रोग लग जाते हैं।

जल में घुलने वाली अशुद्धियों को दो भागों में बाटा जा सकता हैं- क. विभिन्न प्रकार के रासायनिक द्रव्य उस मिट्टी में से पानी में मिल जाते हैं, जिसमें से पानी होकर गुजरता है।

जहाँ इनमें से कईं हानिकारक होते हैं, वहीं कई बिलकुल हानिकारक नहीं होते। ख. ऐसी अशुद्धिया पशु-पक्षी या वनस्पतियों के सड़-गलकर पानी में मिलने से उत्पन्न होती हैं। ये कई प्रकार के रोगों को उत्पन्न करने वाली होती हैं।

पीने के पानी का निम्न स्थानों यर अशुद्ध होना संभव है:

अ. उद्गम स्थान पर कुआं, तालाबों और झरनों पर लोगों के नहाने और कपड़े धोने, पानी निकालने के लिए गंदे बरतनों का प्रयोग और पशुओं को वहीं नहलाने से पानी अशुद्ध हो जाता है।

ब. उद्गम स्थानो से घर तक लाने में मिट्टी और रोगों के कीटाणु पानी में मिल जाते हैं, जो उसे अशुद्ध कर देते हैं।

स. घर में पीने के पानी को गंदे बरतनों में रखने से उसमें कई प्रकार की अशुद्धियां मिल जाती हैं।

दूषित जल से बीमारियां

विभिन्न प्रकार की अशुद्धियों से युक्त जल का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इससे अनेक बीमारियां उत्पन्न हो जाती है।

इनमें हैजा, टायफाइड, चर्म रोग-खुजली, उदर रोग- अपच, पेचिश, पेट दर्द, आंव पीलिया, जुकाम, ज्वर यकृत शोथ, आंखों की बीमारी, विभिन्न प्रकार के कृमि रोग, नारु रोग, पोलियोमायलाइटिस, पेराटायफाइड आदि रोग सूक्ष्म जीव, जीवाणु, बीजाणु, कोषाणु, विषाणु से जल के दूषित होने पर आते हैं।

इसके अलावा पानी में अधिक मात्रा में फ्लोराइड होने पर शरीर की अस्थि रचना दोषपूर्ण हो जाती है और दांतों की समस्याएं पैदा हो जाती हैं। लोहे की मात्रा यदि 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा हो जाती है, तो उल्टियां होना, जी घबराने लगना जैसी तकलीफें होने लगती हैं।

कुएं, झील, हैंड पंपों, नदी, तालाबों से प्राप्त पानी में अकसर कई तरह के लवण व लोहा, मैंगनीज, सिलिका, नाइट्रेट, फास्फेट की मात्रा हमारे शरीर द्वारा स्वीकार की जाने वाली मात्रा से अधिक होती है। ऐसे पानी का स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है। केडमियम से गुर्दे, बेरियम कार्बोंनेट से ह्रदय, रक्त कोशिकाएं व आर्सेनिक के लवण से कैंसर की तकलीफें व बीमारियां हो सकती हैं।

जल शुद्धि के उपाय

चिकित्सकों का मत है कि यदि हर परिवार अपने लिए पीने का साफ व कीटाणुरहित पानी प्रयोग में लाए, तो दूषित पेय जल से होने वाली 90 प्रतिशत बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

पीने के पानी को रखने का स्थान साफ़-सुथरा और जमीन से ऊंचाई पर स्थित होना चाहिए। पानी भरने के लिए मिट्टी व तांबे का घड़ा सबसे उपयुक्त होता है। गर्मी में मिट्टी के घड़े और सर्दी में तांबे के घड़े का पानी पीना उत्तम होता है।

निम्न घरेलू उपाय अपनाने से जल को शुद्ध किया जा सकता हैं?

फिटकिरी- यदि मटमैला तथा गंदा पानी हो, तो बाल्टी में आधा चम्मच पिसी फिटकिरी का चूर्ण अच्छी तरह मिलाकर 5-10 मिनट तक रख दें और फिर छान कर पीने के पात्र में भर दें।

उबालना- पानी को उबालना उसे शुद्ध करने का सबसे सरल उपाय है। कम से कम 15 से 20 मिनट तक पानी को उबालने से उसके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। उबले पानी को ठंडा कर सेवन करने से 60 प्रतिशत रोगी से बचा जा सकता है।

छानना- पानी की बिना छाने न पिएं, क्योंकि जल में तैरने वाले बड़े-बड़े कणों की अशुद्धियां कपड़े को दोहरा करके छानने से दूर हो जाती हैं।

चूना- केवल ताजे चूने से जल शुद्ध करें। 5 लीटर पानी में एक ग्राम चूना मिलाकर रख दें। गंदगी बैठ जाएगी, फिर इसे छान कर पिएं।

क्लोरीन- एक लीटर पानी में 2-3 बूंद क्लोरीन डालकर हिलाएं और आधा घंटे बाद पानी प्रयोग करें। क्लोरीन की गोलियों भी बाजार में आसानी से मिल जाती है।

पोटेशियम परमैंगनेट- यह अधिकांश जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। 5 लीटर पानी में इसके 10-12 दानें इकट्ठे डाल दें। रात में यह उपाय करके सुबह उस पानी का उपयोग करें।

आयोडीन- जल में शुद्ध आयोडीन मिलाने से 10 मिनट में जल जीवाणु विहीन हो जाता है। आधे घंटे बाद जल पिएं।

तुलसी- 25-30 पत्ते एक मटके पानी में पहले से धोकर डाल दें। फिर उसमें पानी भर दें। कुछ घंटों में जल शुद्ध हो जाएगा।

उपरोक्त घरेलू उपायों के अलावा आजकल बाजार में भिन्न-भिन्न प्रकार के वाटर फिल्टर्स उपलब्ध हैं, जिनसे 5 लीटर से अधिक पानी भरकर आसानी से कीटाणुरहित करके शुद्ध किया जा सकता है। नल के टेप में भी फिल्टर्स लगाए जा सकते हैं। यहां-वहां गंदे वातावरण, होटलों, टंकियों के पानी को पीने से बचें। यदि बाहर पानी पीना ही पड़े, तो मिनरल वाटर की बोतल का इस्तेमाल करें।

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