एक्स-रे क्या है? एक्स-रे के उपयोग

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एक्स-रे क्या है? एक्स-रे के उपयोग: बहुत से मरीजों की आदत होती है कि चाहे उन्हें एक्स-रे कराने की जरूरत हो या न हो, जब तक वे एक्स-रे करा नहीं लेंगे, संतोष नहीं होगा।

उन्हें यह नहीं मालूम कि बार-बार एक्स-रे करवाने से न सिर्फ शरीर के उस भाग की कोशिकाओं के अपूर्णीय क्षति हो सकती है, बल्कि कैंसर जैसा घातक रोग तक हो सकता है।

एक्स-रे के बढ़ते उपयोग

आधुनिक चिकित्सा पद्धति में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड एवं सी. टी. स्कैन आदि उपकरणों की उपयोगिता आज इतनी बढ़ गई है कि 70 प्रतिशत से भी अधिक रोगों की पहचान एवं निदान के लिए इन्हीं उपकरणों की मदद ली जाती है।

हमारे देश में दिन-प्रतिदिन संस्थानों में टैली भाषा मशीनों में, औद्योगिक संस्थानों में विकिरण स्रोत के रूप में काम में आ रही है।

अब चिकित्सा विज्ञान के अलावा वैज्ञानिक गवेषणाओँ और उद्योगों में एक्स-रे का उपयोग काफी होने लगा है। एक्स-रे परीक्षण अब मोटर गाडियों और विमानों के अंगों के लिए भी नियमित रूप से होने लगा है।

अनेक उत्पादों का सुधार भी एक्स-रे की सहायता से किया जाता है। अत: बढ़ते हुए उपयोगों को देखते हुए यह जरूरी है कि विकिरण संरक्षण के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ाई जाए।

एक्स-रे निदान में सुविधा

एक्स-रे से हड्डियों, फेफड़ों, गुर्दों , पाचन संस्थान, मस्तिष्क, ह्रदय की बीमारियां, कैंसर आदि रोगी की जांच में बहुत सहायता मिलती है और रोग का सहीं निदान करने में महत्त्वपूर्ण तथा प्रकाश में आते है।

आमतौर पर इन जांचों के दौरान रोगी को विकिरण की मात्रा नहीं के बराबर लगती है। लेकिन बार-बार एक्स-रे कराते रहना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद नहीं होता।

एक्स-रे से नुकसान

एक्स-रे के उपयोग से वैसे ही भारी दुष्परिणाम हो सकते है, जैसे अन्य किस्म के विकिरणों से होते है। परिभाषा ऊर्जा नियमन बोर्ड के अनुसार एक्स-रे के अधिक उपयोग से मोतियाबिंद और त्वचा के गंभीर क्षति पहुंचने के अलावा कोशिकाओं में परिवर्तन तक हो सकता है।

अध्ययनों से पता चला है कि आज सर्वाधिक विकिरण एक्स-रे यूनिटों से हो रहा है, जोकि परमाणु रिएक्टरों से होने वाले विकिरण से कहीं ज्यादा है।

एक्स-रे विकिरण किसी न किसी प्रकार से जैव विकास को प्रभावित करती है। अंग विशेष पर ये किरणें कोशिकाओं का क्षय करती हैं।

जिसके परिणाम स्वरूप चर्म का क्षय, शारीरिक शक्ति का ह्रास, बालों का क्षय, प्रजनन संबंधी क्षमता में कमी, शिशु का विकृत होना, नासूर, जी मिचलाना, उलटी आना, शरीर मेँ गर्मी महसूस होना, सिर दर्द, त्वचा में जलन, छाले पड़ना, उसका चित्तीदार होना, आंखों में मोतियाबिन्द, त्वचा पर घाव, खून का कैंसर (ल्यूकेमिया), खून की कमी, उम्र से पहले बुढ़ापा आदि तकलीफें तत्काल या धीरे-धीरे प्रकट होना शुरू होती हैं।

विकिरण द्वारा शरीर पर दुष्प्रभाव दो प्रकार से पड़ता है। प्रथमत: स्टोकेस्टिक प्रभाव, ये अल्प मात्रा पर भी संभावित होते हैं और कैंसर होना, जनन ग्रन्थियों में उत्परित (म्यूटेशन) होना आदि तकलीफें पैदा करते है। दूसरे, बॉब स्टोकेस्टिक प्रभाव विकिरण की किसी निश्चित मात्रा पर ही संभव हो पाते हैं।

इनसे चमड़ी का जलना और मोतियाबिन्द जैसी तकलीफें होती हैं। वैसे तो हमारे शरीर में प्राकृतिक और रोजमर्रा की क्रियाओं द्वारा विकिरण की कुछ न कुछ मात्रा हमेशा प्रवेश करती ही रहती है।

सूर्य जब अति सक्रिय हो जाता है, एक्स-रे तो अधिक परिणाम में निकलने लगती है। इसका अधिकांश भाग वायुमंडल में छनने के बावजूद 10 से 15 रेम की मात्रा हमारे शरीर में हर वर्ष प्रवेश कर जाती है।

निदान के बढ़ते दायरे

बीमारियों के निदान में अब चिकित्सा विज्ञान में सबसे सुरक्षित तरीके मेजर रेजोनेंस इमेजिन मेथड और अस्ट्रासाउंड माने जाते है।

मेजर रेजोनेंस इमेजिन मेथड में चुम्बकीय शक्ति द्वारा मरीज के रोगग्रस्त भाग की सफल पहचान कर ली जाती हैं। इसमें शरीर पर कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं पड़ता।

इस विधि में हड्डी के दोनों तरफ की तस्वीरें स्पष्ट रूप से उभर कर आती है, जबकि एक्स-रे में ऊपर की एक तरफ की ही तस्वीर आती है। सिर की चोट में ऊपर तथा नीचे, दोनों भाग को इसके द्वारा देख लेते है। इसके अलावा जोड़ों के लिगामेंट्स, तंत्रिकाओँ के नर्व रूट्स भी दिख जाते है।

अल्ट्रासाउंड में करीब-करीब सभी बीमारियों का निदान आसानी से और लगभग शत-प्रतिशत ठीक किया जा सकता है। इसमें अत्यधिक आवृति वाली तरंगों का उपयोग होता है। इसके प्रयोग से मरीज के शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। इससे पांच सप्ताह के अंदर ही गर्भस्थ शिशु का पता भी चल जाता है।

इको कार्डिंयोग्राफी द्वारा दिल के वाल्व की खराबी, धमनियों के अंदर रक्त का बहाव देखा जा सकता है। पेट, पित्ताशय, गुर्दे आदि की बीमारियों का पता भी इको कार्डिंयोग्राफी मशीन की मदद से अल्ट्रासाउंड द्वारा किया जाने लगा है।

महिलाओं के स्तन रेडियोधर्मी किरणों के प्रति अति संवेदनशील होने के कारण एक्स-रे कराने से स्तन कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है, जो 25 वर्षों बाद भी विकसित हो सकता है।

बच्चों में होने वाले रक्त कैंसर में 6 प्रतिशत गर्भावस्था में एक्स-रे कराना है। उल्लेखनीय है कि एक्स-रे प्रक्रिया में रेडियों सक्रियत्ता वाले आइसोटोप सूक्ष्म मात्रा में भी रक्त कैंसर की स्थिति उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं।

बचाव ऐसे करें

  • एक्स-रे विकिरण से बचने के लिए बार-बार एक्स-रे कराने से बचना चाहिए।
  • अनावश्यक एक्सपोजर से बचें।
  • आवश्यक होने पर ही एक्स-रे करवाएं एवं एक्स-रे यूनिट से जितना दूर रह सके उतना ही अच्छा रहेगा।
  • विकिरण अवरोधक ‘लेड एप्रन’ का आवश्यकतानुसार प्रयोग अवश्य करें, उसे आपके प्रजनन अंग ढके रहेंगे।
  • आंखों के बचाव के लिए लेड का ग्लासयुक्त गॉगल एक्स-रे तकनीशियन पहनें, जिससे आंखों की रक्षा हो सके।
  • गर्भवती महिलाओं को चाहिए कि अपनी गर्भावस्था की जानकारी डॉक्टर को अवश्य दे ताकि अत्यावश्यक होने पर ही एक्स-रे कराया जाए।

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