15+ Best 10 lines short stories with moral in Hindi
10 lines short stories with moral in Hindi: हर बच्चा 10 लाइन की Short Stories बहुत ही ज्यादा पसंद करता है। क्युकी ये छोटी और मजेदार कहानिया होती है। हम बच्चो के लिए 10 से ज्यादा Short Stories with Moral in Hindi लेकर आए है। उम्मीद करते है बच्चे इन कहानियो से अच्छी शिक्षा हासिल करे। और 10 Lines Short Stories with Moral in Hindi में ऐसे बहुत सी सिखने वाली चीजे होती है, जिससे बच्चो के साथ साथ बड़े भी बहुत ही कुछ सिख सकते है।
10 lines short stories with moral in Hindi
बच्चे इन छोटी छोटी कहानियों Short Stories in Hindi से अपनी समझ का बहुत ही अच्छे से विकास कर सकते है और सही गलत की पहचान कर सकते है। यह एक अच्छा तरीका है की बच्चो को कहानियो से कुछ भी नया और अच्छा सिखाया जा सकता है।
प्रत्येक कहानी के अन्त में कहानी से मिलने वाली सीख की जानकारी भी दी गयी है, जिसे बच्चे पढ़कर ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि ये छोटी-छोटी कहानियाँ कम समय में बालमन को गुदगुदाने के साथ अभिभावकों का भी मनोरंजन करेगीं।
तो चलिए अब देर न करते हुए 10 Lines Short Stories with Moral in Hindi में पढ़ते है।
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सच्ची मित्रता
दो मित्र थे, रघुनाथ और श्रीधर। वे दोनों ठी संस्कृति के महान पण्डित थे। एक बार वे दोनों एक नाव में सवारी कर रहे थे। सवारी करते…करते श्रीधर ने रघुनाथ से कहा, मित्र, समय नहीं कट रहा है। मैं तुम्हें अपने ग्रन्थ के कुछ अंश पढ़कर सुनाता हूँ। यह कहकर उसने अपने सामान में से न्यायदर्शन पर लिखा ग्रन्थ निकाला।
श्रीधर ग्रन्थ के अंश पढ़ने लगा। कुछ देर तक तो रघुनाथ सुनता रहा फिर उसका चेहरा मुरझाने लगा और वह अचानक रोने लगा। श्रीधर ने ग्रन्थ का पाठ रोकर उसके रोने का कारण पूछा।
गहरी साँस लेते हुए रघुनाथ ने कहा, मित्र! मेरी तो सारी तपस्या निष्फल हो गयी। श्रीधर ने पूछा, ऐसा क्यों कह रहे हो? रघुनाथ बोला, मैंने भी न्यायदर्शन पर एक ग्रन्थ लिखा है। मुझे लगता था कि मेरा ग्रन्थ बेजोड़ है और मुझे उससे बहुत यश मिलेगा, लेकिन तुम्हारे ग्रन्थ के अंशों को सुनने के बाद मेरी आशाओं पर पानी फिर गया। तुम्हारा ग्रन्थ मेरे ग्रन्थ से भी उत्तम हैं।
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इसके सामने मेरे ग्रन्थ को कोई पूछेगा भी नहीं। भला सूर्य के सामने दीपक की क्या बिसात। यह कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगा। श्रीधर मुस्कराते हुए बोला, मुझे पता नहीं था कि तुमने भी इसी विषय पर ग्रन्थ लिखा है। लेकिन इसमें दु:खी होने वाली क्या बात है? विश्व में ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका हल न निकाला जा सकता हो। यह कहते हुए श्रीधर ने अपना ग्रन्थ फाड़ कर नदी में बहा दिया जोर सच्ची मित्रता का परिचय दिया।
तारीफ
सज्जन नाम का एक व्यक्ति था। उसकी दयालुता और बुद्धिमानी के चर्चे दूर-दूर तक थे। एक बार उसकी तारीफ राजा चन्द्रभान के कानों में पड़ी। राजा ने प्रसन्न होकर उसे कई गांवों का अधिकारी बना दिया।
अधिकारी बनने के बाद एक दिन वह राजा से मिलने गया और अपनी तारीफों के पुल बाँधने लगा। उसने राजा से कहा, मेरे जैसा कोई नहीं है। मैं महान हूँ। सच्चा न्यायाधीश हूँ। मेरे जैसा दयालु व्यक्ति आज तक कहीं नहीं देखा। उसकी बात सुनकर राजा को बहुत हैरानी हुई और निराशा भी। वह सोचने लगा कहीं मैंने गलत फैसला तो नहीं तो लिया।
राजा ने सज्जन से कहा, तुम बहुत घमण्डी और बदमिजाज व्यक्ति हो। पद हाथ में आते ही सातवें आसमान पर जा बैठे। अपनी तारीफ खुद करने वाला कभी जनता के साथ न्याय नहीं कर सकता। सज्जन मुस्कराया और बोला, महाराज! मैंने जो कुछ भी अभी कहा इसके लिए मुझे क्षमता करें। लेकिन मैं तो अपने कानों को पक्का कर रहा हूँ।
बहुत जल्दी मुझे ऐसे चापलूस मिलेंगे, जो दिन-रात इसी तरह मेरी प्रशंसा करते रहेंगें। यदि मैंने भूल से भी उनकी प्रशंसा पर भरोसा कर लिया, तो मैं पथ से भटक जाऊँगा ओर विलासिता में डूब जाऊँगा।
हो सकता है कि मैं निरंकुश भी हो जाऊँ। इसलिए मैंने अपनी प्रशंसा के शब्द खुद ही बार-बार बोलने शुरू कर दिये है। ताकि मेरे कान पक्के हो जायें। मेरे कान इन शब्दों को सुनने के आदी हो जायेंगे, तो चापलूसों की बातें का मुझ पर प्रभाव नही पड़ेगा और में जनता की सेवा ठीक से कर पाऊँगा।
सज्जन की बात सुनते ही राजा को समझ में आ गया कि वह चापलूसों से घिरा हुआ है। बातों-बातों में सज्जन ने राजा को ज्ञान दे दिया था। राजा बहुत शर्मिन्दा हुआ और उसने अपने सभी चाटुकारों की छूट्टी करते हुए अपने विवेक से राजकाज करना शुरू कर दिया।
चाय के कप की सुन्दरता का रहस्य
एक दिन मिट्टी के बरतन बनाने वाला रामसखा चाय का कप बना रहा था। उसने मिट्टी का लौंदा उठाया और उसे खूब पीटा-पटका। फिर उसे चाक पर रखकर जोर से घुमाया। मनचाहा रूप ढालकर उसे भट्टी में रख दिया। थोड़ी देर बाद उसे बाहर निकाला, नुकीले ब्रश से झाड़ा और रंग दिया। फिर कप को दोबारा भट्टी में रख दिया।
लेकिन इस बार भट्टी का तापमान पहले की तुलना में ज्यादा था। जैसे ही रामसखा ने केप को भट्टी से निकाला कप चिल्लाने लगा। उसने कहा, बस, बहुत हो गया। अब मैं और कष्ट नहीं सहूँगा। पहले ही तुम मुझे बहुत परेशान कर चुके हो। तुम उस भट्टी में देखो, तब पता चलेगा कितनी घुटन होती है। तुमने मुझे बहुत कष्ट दिया हैं। मैं इसके लिए तुम्हें कभी माफ नहीं करूँगा।
कप की बात सुनकर रामसखा ने उसे आईने के सामने रख दिया। जैसे ही कप ने खुद को आईने में देखा, तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि वह इतना खूबसूरत बन चुका है। रामसखा ने कहा मुझे तुन्हारे कष्ट का अंदाजा था, लेकिन यदि मैं तुम्हें मिट्टी का लौंदा ही बने रहने देता, तो आज तुम इतने सुन्दर नहीं लग सकते थे।
मुझे पता है कि तुम्हें भट्टी के भीतर कैसा लगा होगा। लेकिन मैंने तुम्हें वहाँ नहीं रखा होता, तो तुम चटख जाते। मैंने तुम पर दम घोंटने वाले बदबूदार रंग लगाये। यदि मैं ऐसा नहीं करता, तो तुममें कठोरता नहीं आती। अब तुम पूरी तरह तैयार हो गये तो। यह सुनकर कप समझ गया कि कठोर परीक्षा के बाद ही सुन्दर भविष्य हासिल होता है। कप अपने सारे कष्ट भूल गया और उसने अपनी खूबसूरती के लिए रामसखा को धन्यवाद दिया।
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